अंतरजाल
मेरी कविताएं, कहानियां, संवाद और लेख...
शनिवार, 11 जून 2016
सांझ
खंडहर उदास
खड़ा है
समय की रेत पर
परित्यक्त सा
पड़ा है
उसे अब कोई
प्यार नहीं करता
उसके होने ना होने से
किसी को फर्क नहीं पड़ता
खंडहर इस बात को
समझता है
रोज घूरती सी
नजरों को सहता है
खंडहर अब ढह
जाना चाहता है
अपनों से तिरस्कृत
मर जाना चाहता है...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें