बुधवार, 31 मई 2017

आकर्षण का नियम / कितना सच कितना झूठ


आजकल 'आकर्षण के नियम Law Of Attraction' की चर्चा जोरों पर है. इससे सम्बंधित पुस्तकों, वीडियो और वर्कशॉप्स की मानो बाढ़ सी आई हुई है. मानवीय लालच और लालसा को लुभाता इसका बड़ा भारी बाजार खड़ा हो गया है.
इस नियम को एक ऐसी कुंजी बताया जा रहा है जिसके द्वारा कुछ भी असंभव नहीं. इसके प्रयोग से धन दौलत, रुतबा, प्रेम और शांति सब आपके चरणों में लोटने लगेंगे.
यह नियम अहसासों पर आधारित है.
जैसे भाव होंगे वैसा ही फल मिलेगा. विशेषज्ञों द्वारा इसे तीन चरणों में बांटा गया है. पहले में इच्छित वस्तु की कामना यानि उसका लक्ष्य निर्धारण या फिर कहें की उसकी मानसिक कल्पना. दूसरे चरण में भाव करना की वह वस्तु या लक्ष्य आपको प्राप्त हो गया है और तीसरे में अस्तित्व को धन्यवाद देना, अहोभावपूर्ण होना.
तकनीकी रूप से इस नियम की प्रयोग विधि में कोई कमी दिखाई नहीं देती. यह बेहद सरल प्रतीत होता है. फिर क्या कारण हैं की इसके अभ्यासी को समुचित फल प्राप्त नहीं होता, और शायद कभी होगा भी नहीं.
क्योंकि प्रत्येक का अपना प्रारब्द्ध है.
आकर्षण का नियम अपना कार्य करता है लेकिन इसका फैलाव इतना अधिक है की यह व्यक्ति के वर्तमान जीवन का अतिक्रमण कर जाता है. सनातन मान्यता जन्म जन्मांतर में विश्वास करती है. पूर्वजन्म इस मान्यता में एक सर्वमान्य सत्य है. साथ ही यह भी कहा जाता है की प्रत्येक वर्तमान जन्म अतीत के जन्म का ही प्रतिफल है. अनंत जन्मों से गुजरती हुई यह आत्मा की वह विकास यात्रा है जिसमे उसे अंतत: परमात्मा में लीन होना है.
व्यक्ति सामाजिक मानदंडों पर सुख दुःख और सफलता असफलता की परिभाषा तय करता है. जबकि अंतरात्मा जिसे अवचेतन मन भी कहा गया है इन सबकी कुछ और ही परिभाषा लिये होती है.
सनातन दर्शन कहता है की जीव का प्रत्येक जन्म उसका स्वयं का चुनाव है. स्वयं के विकास के लिए वह अमीर, गरीब, राजा, रंक, अपाहिज, सक्षम, अक्षम, स्त्री, पुरुष किसी भी रूप में जन्म लेता है. परमात्मा से मिलन की अपनी अनेक जन्मों की यात्रा में लिया गया प्रत्येक जन्म उसकी स्वयं की ही इच्छा है भले ही वह कितना भी दुखद और यंत्रणापूर्ण क्यों ना हो.
इस प्रकार विभिन्न अनुभवों से जीवात्मा स्वयं को परिपक्व करती हुई एक दिन निर्विकार हो मोक्ष को प्राप्त हो जाती है. और इस सम्पूर्ण यात्रा में अस्तित्व उसकी चाह के साथ सहयोग करता है.
अब यह आकर्षण का नियम ही है जो की जीवात्मा की जीवन यात्रा में उसके साथ चलता है.
जब वर्तमान जन्म में जीवात्मा ने एक निश्चित आकार प्रकार संकल्पित कर जन्म ले लिया है तो कहा जा सकता है की अब उसमे कोई फेरबदल संभव नहीं. जो फेर बदल जैसा दिखाई दे रहा है वह उसी संकल्पना का ही हिस्सा है. इसे Divine Plan या दैवीय इच्छा भी कहा जाता है.
ज्योतिष भी इसी बात की पुष्टि करता है.
ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक का व्यक्तित्व, कल्पना, पराक्रम, आनंद, संघर्ष और प्राप्तियां भिन्न होते हैं.
और यह सब जन्म जन्मांतर तक फैली विस्तृत यात्रा की वह वर्तमान अभिव्यक्ति होते हैं जिन्हें जीवात्मा ने आकर्षण द्वारा आयोजित किया है…

बुधवार, 24 मई 2017

काल भ्रम

नगर में डुग्गी पिट रही थी सावधान...
सब नगरजन ध्यान से सुनिए कल महामंडप में आचार्य सत्यकीर्ति का व्याख्यान होगा, सम्राट भी उनके श्रीचरणों में उपस्थित रहेंगे. आप सब भी उपस्थित होकर जीवन सुफल कीजिये.

सुकांत ने भी इस घोषणा को सुना और निश्चय किया की वह व्याख्यान सुनने जायेगा. सुकांत एक गरीब लेकिन शिक्षित युवक था आध्यात्मिक वार्ताएं और वादविवाद उसकी रूचि का विषय थे. आजकल सनातन धारा पर पड़ रहे विपरीत विचारों से वह कुछ उद्वेलित रहता था. उसने महसूस किया था सम्राट भी इन विधर्मी विचारों के गहरे प्रभाव में थे.

नियत समय पर व्याख्यान शुरू हुआ महामंडप खचाखच भरा था. आचार्य सत्यकीर्ति वर्तमान में जीने की कला पर बोल रहे थे.
उन्होंने समझाया ना अतीत ना भविष्य केवल वर्तमान, वर्तमान में जीना ही धर्म है भगवत्ता है. अतीत जा चुका है भविष्य अभी आया नहीं हमारे पास केवल वर्तमान है और इसमें रमना ही ध्यान है योग है निर्वाण है.
लोग मंत्रमुग्ध होकर जीने की कला सीख रहे थे.

अल्पकाल में ही आचार्य के विचारों का प्रभाव राज्य में हो चला था यहां तक की सम्राट भी उनके बड़े प्रशंसक थे और राज्य भर में उनके व्याख्यान और उपदेश आयोजित करवाने लगे थे. सामंतों और श्रेष्ठियों में आचार्य सत्यकीर्ति का शिष्य बनने की होड़ सी लगी थी.
माना जाता था कि चेतना का परम विस्फोट उनमे हो गया है और उन्होंने सत्य पा लिया है.

व्याख्यान समाप्ति पर उपस्थित लोगों से कहा गया यदि कोई जिज्ञासा हो तो आचार्य से पूछ लें. सुकांत ने हाथ उठा कर प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी.
आचार्य ने सिर हिला कर हामी भरी. सुकांत खड़ा हुआ और बोला आचार्य क्या आप वास्तव में मानते हैं कि वर्तमान होता है. लोग सुकांत का प्रश्न सुनकर हंसने लगे सामंतों और श्रेष्ठियों के मुख पर भी उपहास का भाव आ गया.
आचार्य ने कहा हां मैं मानता हूं वर्तमान होता है.
सुकांत ने दूसरा प्रश्न किया कितना बड़ा होता है वर्तंमान, जैसे अतीत और भविष्य पर्याप्त लम्बे हैं ऐसे ही वर्तमान कितना बड़ा होता है.
आचार्य बोले वर्तमान सूक्ष्म होता है.

सुकांत ने फिर पूछा कितना सूक्ष्म आखिर उसका कोई आधार बिंदु तो होगा जहां ठहरा जा सके.
आचार्य ने उलझन भरी निगाहों से सुकांत को देखा इधर लोगों के चेहरों पर से भी हंसी गायब हो गई और वह अचरज से कभी सुकांत और कभी आचार्य को ताकने लगे.

सुकांत बोला आपके अनुसार अतीत और भविष्य के मध्य रमण ही भगवत्ता है तो फिर उस मध्य में अवकाश होना चाहिए जिसमें रमा जा सके कृपया उस अवकाश को चिन्हित करें.

आचार्य के माथे पर पसीने की बूंदे छलछला आईं अटकते से बोले वह बोध का पल है उसे मापा नहीं जा सकता.
सुकांत बोला इसका अर्थ हुआ वह अतीन्द्रिय है और जो अतीन्द्रिय है वह समय से पार है. यानि जब हम वर्तमान में होंगे तब समय होगा ही नहीं ना अतीत होगा ना भविष्य सभी कुछ सापेक्ष होगा, जो होगा वह शुद्ध वर्तमान होगा.
जैसे गणित में दो सामानांतर रेखाएं अनंत पर मिलती हैं शायद वैसे ही अतीत और भविष्य भी अनंत में ही वर्तमान से मिलते हैं आचार्य.
क्या यह सच नहीं की मनुष्य के पास केवल अतीत और भविष्य होते हैं वर्तमान कभी होता ही नहीं. वर्तमान एक सम्भावना है पारलौकिक सम्भावना.  
आचार्य के मुंह से बोल नहीं फूटा.

उपस्थित जनसमूह विस्मित था और सम्राट आश्चर्य से आचार्य सत्यकीर्ति की ओर देख रहे थे.
आचार्य के मुख पर विषाद की घनी छाया थी.

सोमवार, 22 मई 2017

बकरा

सतपाल की निगाह बार बार अलमारी की ओर जाती फिर वह खिड़की से बाहर झांकने लगता.
आज होली है लेकिन गली में कोई चहल पहल अभी तक शुरू नहीं हुई. कमाल के बच्चे हैं आजकल के, रंग खेलने का भी उत्साह नहीं हम जब छोटे थे तो मुंह अंधेरे ही शुरू हो जाते थे.
बच्चे शुरू करें तो धीरे धीरे बड़े भी घर से निकलेंगे. आठ बज गए लेकिन त्यौहार का कोई माहौल ही नहीं हद है भई.

सतपाल ने कल ही व्हिस्की का कोटा लाकर अलमारी में रख दिया था.
होली का त्यौहार है पता नहीं कौन घर आ जाए, सामान हो तो शर्मिंदगी महसूस नहीं होती एक यही दिन तो है जब आदमी सुबह से और खुलकर पीता है वरना तो साल भर अदब और लिमिट की ही चलती है.

आखिरकार वह उठा और अलमारी से बोतल निकाल ली, एक मार लिया जाए तो मूड बन जायेगा फिर आराम से लेते रहेंगे. पता नहीं दिन भर किस किस के साथ क्या क्या पीना पड़ेगा कोई बीयर पिलाता है कोई व्हिस्की तो कोई रम होली पर सब घालमेल हो जाता है.

पैग खत्म होते होते गली से बच्चों का छिटपुट शोर आने लगा, बच्चों की होली शुरू हो गई थी.
सतपाल ने एक स्माल और बना लिया और चुस्कियां लेता हुआ खिड़की से बच्चों की होली देखने लगा. इतने में पत्नी प्लेट में कुछ खाने का सामान ले आई और उसके हाथ में गिलास देखकर बोली हो गए शुरू मुझे पता था, और हां लिमिट में पीना और साथ में कुछ खाते रहना.
सतपाल ने गुलाल निकाला और पत्नी के गालों पर लगाते हुए उसे हैप्पी होली बोल दिया. तभी कॉलबेल बजी, दरवाजा खोला तो देखा पड़ोस के गुप्ता जी और उनकी श्रीमती जी थे. दोनों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया.
एक दूसरे को रंग गुलाल लगाने के बाद सतपाल ने गुप्ता जी से फरमाइश पूछी तो उन्होंने झिझकते हुए अपनी श्रीमती जी की ओर देखा. सतपाल मामला भांपते हुए तुरंत बोला अजी होली की तो छूट होती है एक यही दिन तो हमारा है बाकी सब तो इनके ही हैं.
पत्नियों ने मुस्कुरा कर हामी भरी.
पांच मिनट बाद दोनों जाम टकराते हुए चीयर्स बोल रहे थे.

गली में अब रंगे पुते बड़े भी होली खेलते दिखने लगे.
तभी बाहर से आवाज आई अरे भाई सतपाल बाहर निकलो होली है. जल्दी से गिलास खाली कर सतपाल और गुप्ता जी गुलाल का पैकेट थामे बाहर लपके.

धीरे धीरे त्यौहार जोश और उन्माद की ओर बढ़ने लगा.
यहां वहां होली खेलते पीते खाते आठ दस पुरुषों का झुण्ड गली के बाहर पार्क में आ बैठा. सब सुरूर में थे. बच्चे भी पार्क में टोलियां बनाकर उत्पात मचाने लगे. बीच बीच में किसी की पत्नी आती और इन पुरुषों पर गुलाल या रंग उंडेल कर हंसती हुई अपने टोले में जा बैठती.

हवा में मानों मस्ती घुली थी, कोई ढोलक ले आया तो किसी ने रंगीन पटाखे की लड़ी में आग लगा दी हर तरफ हुड़दंग का माहौल था.
पीने खाने का सामान सब पार्क में ही आ गया. हंसी, मजाक और चुटकुलों के बीच पीना पिलाना चलता रहा. पीते पीते दोपहर चढ़ आई और सतपाल को तगड़ा नशा हो गया.

बातों बातों में खाने पर बात चल निकली. चौहान साहब बोले हम तो भाई आज बकरा खाएंगे, हमारी तो खानदानी परंपरा है होली पर घर में बकरा जरूर बनता है. सुबह ही बना लिया था.
दो एक और लोगों ने भी हामी भरी की उनके घर भी होली पर मटन बनता है वे भी आज मीट खाएंगे.

सतपाल के मुंह में पानी आ गया. मन में स्वादिष्ट तरीदार मीट के चित्र उभरने लगे. मीट की खुश्बू रह रह कर उसके नासापुटों से टकराने लगी.
अचानक उसे अहसास हुआ की उसे तेज भूख लगी है. बहुत दिन हो गए मीट नहीं खाया आज वह भी मीट खायेगा.
उसने हाथ में पकड़ी बीयर की बोतल मुंह से लगाई और गटागट दो बड़े घूंट भरे, मीट खाने का संकल्प और गहरा हो गया.
सतपाल ने नशे में थरथराती आवाज में पूछा आज क्या मीट की दुकान खुली होगी, आज तो होली है. चौहान साहब ने बताया अरे आज ही तो सबसे ज्यादा मीट बिकता है. दुकान जरूर खुली होगी. आज के दिन और दिनों से तिगुनी चौगुनी सेल होती है.

सतपाल ने एक ही सांस में बीयर खत्म की और झूमते हुए बोला अच्छा भाईयों मैं चला मीट लेने. चौहान साहब बोले अरे भाई इस हालत में कहां जाओगे आज हमारी दावत कबूल कर लो या कहो तो टिफिन घर भेजवा दें. और लोगों ने भी रोकने की कोशिश की पर सतपाल ने किसी की एक नहीं सुनी उसके दिमाग पर नशा बुरी तरह हावी था.
थोड़ी दूर ही मेन रोड पर धरमू कसाई की मां काली झटका शॉप थी.
लड़खड़ाते हुए सतपाल धरमू की दुकान पर पहुंचा तो वह अपना मीट काटने वाला लकड़ी का कुन्दा धो रहा था. दुकान के बाहर एक बकरा बंधा था.
सतपाल ने धरमू से मीट की मांग की तो धरमू ने बताया मीट तो ख़त्म हो गया. आज चार बकरों का एस्टीमेट लगाया था पर तीन तक ही ग्राहकी चुक गई. यह जो बाहर बंधा है यह कल कटेगा. थोड़ा बहुत जो बचा था वह नौकर ले गया.
होली पर दोपहर तक ही ग्राहकी होती है इसके बाद कोई नहीं आता.
सुनकर सतपाल का पारा चढ़ गया चीख कर बोला ऐसे कैसे ख़त्म हो गया हमने तो लिया ही नहीं और खत्म भी हो गया. धरमू भी ताव खाकर बोला आपको पहले आना था लोग सुबह ही ले जाते हैं आज के दिन दुकान सुबह पांच बजे खुल जाती है, जाओ अब कल आना.
थरथराती आवाज में सतपाल बोला यह जो बाहर बंधा है इसे काट दे.

ऐसे कैसे काट दूं तुम अकेले के लिए बीस किलो का बकरा काट दूं कल आना अब तो मैंने अड्डा भी धो दिया है. नशे में विवेक खो चुके सतपाल के अंदर जलती क्रोधाग्नि में इस इंकार ने घी का काम किया उसकी आंखों में खून उतर आया.

उसने लपक कर धरमू की बगल में रखा छुरा उठाया और बाहर भागा.
ले तू नहीं काटेगा तो मैं काटता हूं आज तो घर पे बकरा बनकर रहेगा. धरमू भी कूद कर उसके पीछे भागा और छुरा छीनने की कोशिश करने लगा.
इस छीना झपटी में कब छुरा सतपाल के गले की मुख्य नस पर जा लगा पता ही नहीं चला. सब पलक झपकते बिजली की तरह हो गया.
सतपाल के गले से खून का फव्वारा छूटा और वह पछाड़ खा बकरे की बगल में जा गिरा. धरमू के होश उड़ गए उसने तुरंत दुकान का शटर गिराया और बन्दूक से छूटी गोली की तरह भाग खड़ा हुआ.

रंग गुलाल से पुता सतपाल खून के तालाब में मरा पड़ा था और खूंटे से बंधा बकरा मैंssssss मैंssssss की कातर गुहार मचाये था.                    
                         
       
                     
           

गांडू

सुधीर मध्यम गति से मोटर साईकिल चलाता हुआ नाला पार जा रहा था.
अभी बारह भी नहीं बजे थे लेकिन आसमान से आग बरसने लगी थी. कड़ी धूप बदन को झुलसाए दे रही थी.
गर्म हवा के धूल भरे बगूले इधर से उधर उड़ रहे थे.
सुधीर सोचने लगा अगर यह जरुरी पेमेंट ना उठानी होती तो इस माहौल में वह हरगिज बाहर ना निकलता.

अचानक सुधीर की निगाह एक बोरियों से लदे हथठेले पर पड़ी जिसे एक सतरह अठारह साल का लड़का खींच रहा था. लड़का पसीना पसीना होता हुआ पूरा जोर लगा कर ठेले को नाले की पुलिया पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा था पर साफ लगता था यह काम उसके अकेले के बस का नहीं.
सुधीर का कलेजा मुंह को आ गया.
उसने मोटर साईकिल सड़क किनारे एक ओर खड़ी की और हथठेले को धक्का लगाने लगा. सहारा मिलता देख लड़के ने भी उत्साह दिखाया और हाथठेला पुलिया पर चढ़ गया.

सुधीर की इतने में ही सांस फूल गई, हांफते हुए लड़के से बोला 'बड़ा कमीना है तेरा मालिक तुझे अकेले ही इस गर्मी में भेज दिया'.
'जानता नहीं क्या रास्ते में पुलिया पड़ेगी'.
लड़का बोला "जानता है, मैंने पुलिया का कहा भी था पर मालिक बोला तू चल तो सही देखना पुलिया पर कोई ना कोई नर्मदिल गांडू धक्का लगाने के लिए मिल ही जायेगा"

सुनकर सुधीर को समझ नहीं आ रहा था की इस पुलिया पर से नाले में वह खुद कूदे या फिर लड़के को कुदा दे.