सतपाल की निगाह बार बार अलमारी की ओर जाती फिर वह खिड़की से बाहर झांकने लगता.
आज होली है लेकिन गली में कोई चहल पहल अभी तक शुरू नहीं हुई. कमाल के बच्चे हैं आजकल के, रंग खेलने का भी उत्साह नहीं हम जब छोटे थे तो मुंह अंधेरे ही शुरू हो जाते थे.
बच्चे शुरू करें तो धीरे धीरे बड़े भी घर से निकलेंगे. आठ बज गए लेकिन त्यौहार का कोई माहौल ही नहीं हद है भई.
सतपाल ने कल ही व्हिस्की का कोटा लाकर अलमारी में रख दिया था.
होली का त्यौहार है पता नहीं कौन घर आ जाए, सामान हो तो शर्मिंदगी महसूस नहीं होती एक यही दिन तो है जब आदमी सुबह से और खुलकर पीता है वरना तो साल भर अदब और लिमिट की ही चलती है.
आखिरकार वह उठा और अलमारी से बोतल निकाल ली, एक मार लिया जाए तो मूड बन जायेगा फिर आराम से लेते रहेंगे. पता नहीं दिन भर किस किस के साथ क्या क्या पीना पड़ेगा कोई बीयर पिलाता है कोई व्हिस्की तो कोई रम होली पर सब घालमेल हो जाता है.
पैग खत्म होते होते गली से बच्चों का छिटपुट शोर आने लगा, बच्चों की होली शुरू हो गई थी.
सतपाल ने एक स्माल और बना लिया और चुस्कियां लेता हुआ खिड़की से बच्चों की होली देखने लगा. इतने में पत्नी प्लेट में कुछ खाने का सामान ले आई और उसके हाथ में गिलास देखकर बोली हो गए शुरू मुझे पता था, और हां लिमिट में पीना और साथ में कुछ खाते रहना.
सतपाल ने गुलाल निकाला और पत्नी के गालों पर लगाते हुए उसे हैप्पी होली बोल दिया. तभी कॉलबेल बजी, दरवाजा खोला तो देखा पड़ोस के गुप्ता जी और उनकी श्रीमती जी थे. दोनों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया.
एक दूसरे को रंग गुलाल लगाने के बाद सतपाल ने गुप्ता जी से फरमाइश पूछी तो उन्होंने झिझकते हुए अपनी श्रीमती जी की ओर देखा. सतपाल मामला भांपते हुए तुरंत बोला अजी होली की तो छूट होती है एक यही दिन तो हमारा है बाकी सब तो इनके ही हैं.
पत्नियों ने मुस्कुरा कर हामी भरी.
पांच मिनट बाद दोनों जाम टकराते हुए चीयर्स बोल रहे थे.
गली में अब रंगे पुते बड़े भी होली खेलते दिखने लगे.
तभी बाहर से आवाज आई अरे भाई सतपाल बाहर निकलो होली है. जल्दी से गिलास खाली कर सतपाल और गुप्ता जी गुलाल का पैकेट थामे बाहर लपके.
धीरे धीरे त्यौहार जोश और उन्माद की ओर बढ़ने लगा.
यहां वहां होली खेलते पीते खाते आठ दस पुरुषों का झुण्ड गली के बाहर पार्क में आ बैठा. सब सुरूर में थे. बच्चे भी पार्क में टोलियां बनाकर उत्पात मचाने लगे. बीच बीच में किसी की पत्नी आती और इन पुरुषों पर गुलाल या रंग उंडेल कर हंसती हुई अपने टोले में जा बैठती.
हवा में मानों मस्ती घुली थी, कोई ढोलक ले आया तो किसी ने रंगीन पटाखे की लड़ी में आग लगा दी हर तरफ हुड़दंग का माहौल था.
पीने खाने का सामान सब पार्क में ही आ गया. हंसी, मजाक और चुटकुलों के बीच पीना पिलाना चलता रहा. पीते पीते दोपहर चढ़ आई और सतपाल को तगड़ा नशा हो गया.
बातों बातों में खाने पर बात चल निकली. चौहान साहब बोले हम तो भाई आज बकरा खाएंगे, हमारी तो खानदानी परंपरा है होली पर घर में बकरा जरूर बनता है. सुबह ही बना लिया था.
दो एक और लोगों ने भी हामी भरी की उनके घर भी होली पर मटन बनता है वे भी आज मीट खाएंगे.
सतपाल के मुंह में पानी आ गया. मन में स्वादिष्ट तरीदार मीट के चित्र उभरने लगे. मीट की खुश्बू रह रह कर उसके नासापुटों से टकराने लगी.
अचानक उसे अहसास हुआ की उसे तेज भूख लगी है. बहुत दिन हो गए मीट नहीं खाया आज वह भी मीट खायेगा.
उसने हाथ में पकड़ी बीयर की बोतल मुंह से लगाई और गटागट दो बड़े घूंट भरे, मीट खाने का संकल्प और गहरा हो गया.
सतपाल ने नशे में थरथराती आवाज में पूछा आज क्या मीट की दुकान खुली होगी, आज तो होली है. चौहान साहब ने बताया अरे आज ही तो सबसे ज्यादा मीट बिकता है. दुकान जरूर खुली होगी. आज के दिन और दिनों से तिगुनी चौगुनी सेल होती है.
सतपाल ने एक ही सांस में बीयर खत्म की और झूमते हुए बोला अच्छा भाईयों मैं चला मीट लेने. चौहान साहब बोले अरे भाई इस हालत में कहां जाओगे आज हमारी दावत कबूल कर लो या कहो तो टिफिन घर भेजवा दें. और लोगों ने भी रोकने की कोशिश की पर सतपाल ने किसी की एक नहीं सुनी उसके दिमाग पर नशा बुरी तरह हावी था.
थोड़ी दूर ही मेन रोड पर धरमू कसाई की मां काली झटका शॉप थी.
लड़खड़ाते हुए सतपाल धरमू की दुकान पर पहुंचा तो वह अपना मीट काटने वाला लकड़ी का कुन्दा धो रहा था. दुकान के बाहर एक बकरा बंधा था.
सतपाल ने धरमू से मीट की मांग की तो धरमू ने बताया मीट तो ख़त्म हो गया. आज चार बकरों का एस्टीमेट लगाया था पर तीन तक ही ग्राहकी चुक गई. यह जो बाहर बंधा है यह कल कटेगा. थोड़ा बहुत जो बचा था वह नौकर ले गया.
होली पर दोपहर तक ही ग्राहकी होती है इसके बाद कोई नहीं आता.
सुनकर सतपाल का पारा चढ़ गया चीख कर बोला ऐसे कैसे ख़त्म हो गया हमने तो लिया ही नहीं और खत्म भी हो गया. धरमू भी ताव खाकर बोला आपको पहले आना था लोग सुबह ही ले जाते हैं आज के दिन दुकान सुबह पांच बजे खुल जाती है, जाओ अब कल आना.
थरथराती आवाज में सतपाल बोला यह जो बाहर बंधा है इसे काट दे.
ऐसे कैसे काट दूं तुम अकेले के लिए बीस किलो का बकरा काट दूं कल आना अब तो मैंने अड्डा भी धो दिया है. नशे में विवेक खो चुके सतपाल के अंदर जलती क्रोधाग्नि में इस इंकार ने घी का काम किया उसकी आंखों में खून उतर आया.
उसने लपक कर धरमू की बगल में रखा छुरा उठाया और बाहर भागा.
ले तू नहीं काटेगा तो मैं काटता हूं आज तो घर पे बकरा बनकर रहेगा. धरमू भी कूद कर उसके पीछे भागा और छुरा छीनने की कोशिश करने लगा.
इस छीना झपटी में कब छुरा सतपाल के गले की मुख्य नस पर जा लगा पता ही नहीं चला. सब पलक झपकते बिजली की तरह हो गया.
सतपाल के गले से खून का फव्वारा छूटा और वह पछाड़ खा बकरे की बगल में जा गिरा. धरमू के होश उड़ गए उसने तुरंत दुकान का शटर गिराया और बन्दूक से छूटी गोली की तरह भाग खड़ा हुआ.
रंग गुलाल से पुता सतपाल खून के तालाब में मरा पड़ा था और खूंटे से बंधा बकरा मैंssssss मैंssssss की कातर गुहार मचाये था.
आज होली है लेकिन गली में कोई चहल पहल अभी तक शुरू नहीं हुई. कमाल के बच्चे हैं आजकल के, रंग खेलने का भी उत्साह नहीं हम जब छोटे थे तो मुंह अंधेरे ही शुरू हो जाते थे.
बच्चे शुरू करें तो धीरे धीरे बड़े भी घर से निकलेंगे. आठ बज गए लेकिन त्यौहार का कोई माहौल ही नहीं हद है भई.
सतपाल ने कल ही व्हिस्की का कोटा लाकर अलमारी में रख दिया था.
होली का त्यौहार है पता नहीं कौन घर आ जाए, सामान हो तो शर्मिंदगी महसूस नहीं होती एक यही दिन तो है जब आदमी सुबह से और खुलकर पीता है वरना तो साल भर अदब और लिमिट की ही चलती है.
आखिरकार वह उठा और अलमारी से बोतल निकाल ली, एक मार लिया जाए तो मूड बन जायेगा फिर आराम से लेते रहेंगे. पता नहीं दिन भर किस किस के साथ क्या क्या पीना पड़ेगा कोई बीयर पिलाता है कोई व्हिस्की तो कोई रम होली पर सब घालमेल हो जाता है.
पैग खत्म होते होते गली से बच्चों का छिटपुट शोर आने लगा, बच्चों की होली शुरू हो गई थी.
सतपाल ने एक स्माल और बना लिया और चुस्कियां लेता हुआ खिड़की से बच्चों की होली देखने लगा. इतने में पत्नी प्लेट में कुछ खाने का सामान ले आई और उसके हाथ में गिलास देखकर बोली हो गए शुरू मुझे पता था, और हां लिमिट में पीना और साथ में कुछ खाते रहना.
सतपाल ने गुलाल निकाला और पत्नी के गालों पर लगाते हुए उसे हैप्पी होली बोल दिया. तभी कॉलबेल बजी, दरवाजा खोला तो देखा पड़ोस के गुप्ता जी और उनकी श्रीमती जी थे. दोनों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया.
एक दूसरे को रंग गुलाल लगाने के बाद सतपाल ने गुप्ता जी से फरमाइश पूछी तो उन्होंने झिझकते हुए अपनी श्रीमती जी की ओर देखा. सतपाल मामला भांपते हुए तुरंत बोला अजी होली की तो छूट होती है एक यही दिन तो हमारा है बाकी सब तो इनके ही हैं.
पत्नियों ने मुस्कुरा कर हामी भरी.
पांच मिनट बाद दोनों जाम टकराते हुए चीयर्स बोल रहे थे.
गली में अब रंगे पुते बड़े भी होली खेलते दिखने लगे.
तभी बाहर से आवाज आई अरे भाई सतपाल बाहर निकलो होली है. जल्दी से गिलास खाली कर सतपाल और गुप्ता जी गुलाल का पैकेट थामे बाहर लपके.
धीरे धीरे त्यौहार जोश और उन्माद की ओर बढ़ने लगा.
यहां वहां होली खेलते पीते खाते आठ दस पुरुषों का झुण्ड गली के बाहर पार्क में आ बैठा. सब सुरूर में थे. बच्चे भी पार्क में टोलियां बनाकर उत्पात मचाने लगे. बीच बीच में किसी की पत्नी आती और इन पुरुषों पर गुलाल या रंग उंडेल कर हंसती हुई अपने टोले में जा बैठती.
हवा में मानों मस्ती घुली थी, कोई ढोलक ले आया तो किसी ने रंगीन पटाखे की लड़ी में आग लगा दी हर तरफ हुड़दंग का माहौल था.
पीने खाने का सामान सब पार्क में ही आ गया. हंसी, मजाक और चुटकुलों के बीच पीना पिलाना चलता रहा. पीते पीते दोपहर चढ़ आई और सतपाल को तगड़ा नशा हो गया.
बातों बातों में खाने पर बात चल निकली. चौहान साहब बोले हम तो भाई आज बकरा खाएंगे, हमारी तो खानदानी परंपरा है होली पर घर में बकरा जरूर बनता है. सुबह ही बना लिया था.
दो एक और लोगों ने भी हामी भरी की उनके घर भी होली पर मटन बनता है वे भी आज मीट खाएंगे.
सतपाल के मुंह में पानी आ गया. मन में स्वादिष्ट तरीदार मीट के चित्र उभरने लगे. मीट की खुश्बू रह रह कर उसके नासापुटों से टकराने लगी.
अचानक उसे अहसास हुआ की उसे तेज भूख लगी है. बहुत दिन हो गए मीट नहीं खाया आज वह भी मीट खायेगा.
उसने हाथ में पकड़ी बीयर की बोतल मुंह से लगाई और गटागट दो बड़े घूंट भरे, मीट खाने का संकल्प और गहरा हो गया.
सतपाल ने नशे में थरथराती आवाज में पूछा आज क्या मीट की दुकान खुली होगी, आज तो होली है. चौहान साहब ने बताया अरे आज ही तो सबसे ज्यादा मीट बिकता है. दुकान जरूर खुली होगी. आज के दिन और दिनों से तिगुनी चौगुनी सेल होती है.
सतपाल ने एक ही सांस में बीयर खत्म की और झूमते हुए बोला अच्छा भाईयों मैं चला मीट लेने. चौहान साहब बोले अरे भाई इस हालत में कहां जाओगे आज हमारी दावत कबूल कर लो या कहो तो टिफिन घर भेजवा दें. और लोगों ने भी रोकने की कोशिश की पर सतपाल ने किसी की एक नहीं सुनी उसके दिमाग पर नशा बुरी तरह हावी था.
थोड़ी दूर ही मेन रोड पर धरमू कसाई की मां काली झटका शॉप थी.
लड़खड़ाते हुए सतपाल धरमू की दुकान पर पहुंचा तो वह अपना मीट काटने वाला लकड़ी का कुन्दा धो रहा था. दुकान के बाहर एक बकरा बंधा था.
सतपाल ने धरमू से मीट की मांग की तो धरमू ने बताया मीट तो ख़त्म हो गया. आज चार बकरों का एस्टीमेट लगाया था पर तीन तक ही ग्राहकी चुक गई. यह जो बाहर बंधा है यह कल कटेगा. थोड़ा बहुत जो बचा था वह नौकर ले गया.
होली पर दोपहर तक ही ग्राहकी होती है इसके बाद कोई नहीं आता.
सुनकर सतपाल का पारा चढ़ गया चीख कर बोला ऐसे कैसे ख़त्म हो गया हमने तो लिया ही नहीं और खत्म भी हो गया. धरमू भी ताव खाकर बोला आपको पहले आना था लोग सुबह ही ले जाते हैं आज के दिन दुकान सुबह पांच बजे खुल जाती है, जाओ अब कल आना.
थरथराती आवाज में सतपाल बोला यह जो बाहर बंधा है इसे काट दे.
ऐसे कैसे काट दूं तुम अकेले के लिए बीस किलो का बकरा काट दूं कल आना अब तो मैंने अड्डा भी धो दिया है. नशे में विवेक खो चुके सतपाल के अंदर जलती क्रोधाग्नि में इस इंकार ने घी का काम किया उसकी आंखों में खून उतर आया.
उसने लपक कर धरमू की बगल में रखा छुरा उठाया और बाहर भागा.
ले तू नहीं काटेगा तो मैं काटता हूं आज तो घर पे बकरा बनकर रहेगा. धरमू भी कूद कर उसके पीछे भागा और छुरा छीनने की कोशिश करने लगा.
इस छीना झपटी में कब छुरा सतपाल के गले की मुख्य नस पर जा लगा पता ही नहीं चला. सब पलक झपकते बिजली की तरह हो गया.
सतपाल के गले से खून का फव्वारा छूटा और वह पछाड़ खा बकरे की बगल में जा गिरा. धरमू के होश उड़ गए उसने तुरंत दुकान का शटर गिराया और बन्दूक से छूटी गोली की तरह भाग खड़ा हुआ.
रंग गुलाल से पुता सतपाल खून के तालाब में मरा पड़ा था और खूंटे से बंधा बकरा मैंssssss मैंssssss की कातर गुहार मचाये था.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें