पृथ्वी - जमीन बंजर पड़ी है और अगर उस पर खेती हो भी रही है तो वह रसायनों से दूषित है.
जहां देखो वहां कंक्रीट का जंगल उगा है. कहीं पृथ्वी का कोई मोल नहीं तो कहीं वह स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान है. एक अदद घर बनाने के लिए आदमी को पृथ्वी का छोटा सा टुकड़ा तक मयस्सर नहीं. पृथ्वी तत्व लैंगिक और आधारभूत आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है. निर्विवाद सत्य है की आज जितनी लैंगिक लोलुपता दृष्टिगोचर हो रही है और आधारभूत आवश्यकताओं के जो संघर्ष मनुष्य कर रहा है वह पीड़ादाई है.
जल - जल संकट आज एक बड़ा संकट है. नदियां मनुष्य से हाथ जोड़ पनाह मांग रही हैं. नदियों का ईको सिस्टम जगह जगह बांध बना तालाब में बदल गया है. जल के लिए सर्वत्र हाहाकार है. जल महंगे दामों बाजार में बिक रहा है. मन वस्तुत: जल ही है, जल की विषाक्तता ने मन को विषाक्त कर दिया है. आज जितने कलुषित और निकृष्ट मनों का दर्शन हो रहा है वह अभूतपूर्व है.
वायु - तमाम तरह के औद्योगिकीकरण से वायु पर्याप्त दूषित हो चुकी है. वायु का गुण है की वह विरल प्रवाहक है. सो वह जगत के संताप भी ढोती है. जगत आज इतना दुखी है की हवाओं में ही दर्द घुला है. साथ ही 100 में से 90 व्यक्ति वातविकार ग्रस्त हैं.
अग्नि - सर्वाधिक असंतुलन आज अग्नि का ही है. भले वह जठराग्नि हो या फिर कामाग्नि. आज अग्नि सम्यक व्यवहार नहीं कर रही. कहीं उसका स्वाभाव अतिअल्प है तो कहीं वह दावानल बनी हुई है. आज जितने प्राकृतिक और अप्राकृतिक अग्निकांड दर्ज किये जा रहे हैं उतने मानवीय इतिहास में कभी नहीं देखे गए.
आकाश - आकाश यानि अवकाश. सभी कर्म अवकाश होने पर ही सम्पादित होते हैं. आज किसी के पास अवकाश नहीं है, केवल उतना ही अवकाश है जितने में उदरपूर्ति हो सके या फिर वासना शांत की जा सके. धैर्य भी आकाश तत्व है. लेकिन आज धैर्य की सर्वाधिक कमी महसूस की जाती है. कोई कुछ जरा सा विरोध में बोल दे व्यक्ति तुरंत आपा खो देता है. आकाश तत्व बुरी तरह पीड़ित हो चुका है.
कहते हैं युग परिवर्तन के लिए पंच तत्वों का पीड़ित होना आवश्यक है. पुनर्जन्म तभी होता है जब पंच तत्व पीड़ित हो भस्मीभूत हो जाते हैं...