शनिवार, 18 नवंबर 2017

अद्भुत अविश्वसनीय तीर्थ

गुरुग्राम के कार्टरपुरी इलाके में एक गौशाला है 'कामधेनु धाम'.
विशाल भूभाग में फैली इस गौशाला में लगभग 2500 गाय हैं. जितनी सुन्दर व्यवस्था और स्वच्छता इस गौशाला में देखने को मिलती है वह अन्यत्र दुर्लभ है.
गुरुग्राम नगर निगम और विष्णु ट्रस्ट नामक एक NGO इस गौशाला को चलाते हैं.
गौशाला में गायों के लिए एक अस्पताल जो आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है के अलावा श्रीकृष्ण और शिव मंदिर, एक पुस्तकालय और हर्बल उत्पादों की एक दुकान भी है.
गौशाला के प्रबंधक ब्रिगेडियर चौहान इस गौशाला के बारे में जो बताते हैं वह चौंका देने वाला है.
वह इस गौशाला को महातीर्थ की संज्ञा देते हैं बातचीत के दौरान उन्होंने गायों से सम्बंधित अपने जो अनुभव बताये वह रोमांचित कर देते हैं.
ब्रिगेडियर चौहान के अनुसार गायों में प्राकृतिक रूप से टेलीपैथी सम्प्रेषण की क्षमता होती है और इसका उन्हें अनेक बार अनुभव हुआ है. गायों ने उन्हें स्वप्न में भी अपनी पीड़ा और समस्याओं के बारे में बताया है जो जांचने पर सत्य सिद्ध हुआ.
एक बार सर्दियों के दिनों में एक गाय कर्मचारी की लापरवाही से बाहर खुले में ही रह गई कर्मचारी उसे शेड में लाना भूल गया. रात सोते समय ब्रिगेडियर साहब को स्वप्न आया जिसमे गाय कह रही थी मुझे खुले में ही छोड़ दिया गया है और मुझे ठण्ड लग रही है. स्वप्न टूटने पर उन्होंने जांच करवाई तो एक गाय भूलवश बाहर खुले में ही रह गई थी जिसे ढूंढकर शेड में लाया गया.
ऐसे ही एक बार शेड नंबर 4 की एक गाय ने स्वप्न में उन्हें अपने कूल्हे की चोट के बारे में बताया और शिकायत की कि उसके साथ लापरवाही हो रही है. जांच करने पर यह बात भी सत्य निकली.
एक अन्य घटना में एक गाय ने उन्हें स्वप्न में बताया की मैं एक बछिया को जन्म देने जा रही हूं पर मेरी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है. अगली सुबह ब्रिगेडियर साहब ने उस गाय को तत्काल जन्मी बछिया को चाटते पाया.

ब्रिगेडियर साहब ने एक बार स्वप्न देखा की शेड नंबर 2 में गायें नृत्य कर रही हैं.
जागने पर उन्हें यह स्वप्न बहुत अजीब लगा. जब वह सुबह गौशाला पहुंचे तो शेड नंबर 2 के आस पास ही मंडराने लगे. जब शेड की सफाई हो रही थी अधिकांश गायें बाहर खुले मैदान में थीं और कुछ ही गायें शेड में मौजूद थीं. अचानक शेड में मौजूद गायों ने विचित्र हाव भाव के साथ ताल मिलाकर नृत्य जैसा कुछ करना शुरू कर दिया जो की लगभग एक मिनट तक चला. ब्रिगेडियर चौहान आज तक समझ नहीं पाए हैं की उस नृत्य का क्या अर्थ था और गायें उसके जरिये क्या अभिव्यक्त करना चाह रहीं थीं.       
ऐसे ही एक से बढ़कर एक अनुभवों की ब्रिगेडियर साहब के पास भरमार है. उनका कहना है गायों के समक्ष प्रार्थना करने से अनेक लोगों के दुःसाध्य रोग ठीक हुए हैं और मनोकामनाएं पूर्ण हुई हैं.
इसी कड़ी में वह गौशाला की एक ऐसी गाय से मिलवाते हैं जो साधारण गायों से बिल्कुल अलग दिखती है.
इस गाय का रंग सफ़ेद सुनहला और सींग, नेत्र, होठ गुलाबी हैं. ब्रिगेडियर साहब के अनुसार यह कामधेनु गाय है और उसी श्रेणी की गाय है जो समुद्र मंथन में सागर से निकली थी.
यह गाय सात वर्ष पूर्व सड़क पर लावारिस भटकती मिली थी. ब्रिगेडियर चौहान के अनुसार यह दुर्लभ गाय है और अन्य किसी भी गौशाला में नहीं है. इस गाय को सभी मां का सम्बोधन देते हैं. सैंकड़ों गायों के बीच मां पुकारने पर केवल यही गाय सिर उठाकर आपकी तरफ देखती है.
गौशाला में आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है यह चमत्कारिक और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली गाय है.
इस गाय में कुछ विशेषता तो है क्योंकि अन्य गायों की तरह यह खाद्य पदार्थों की तरफ नहीं लपकती. आप कितने भी सुस्वादु व्यंजन ले जाईये लेकिन इसे खिलाना सरल नहीं है. बहुत मनुहार करने और मां मां की गुहार लगाने पर यह आपके द्वारा लाये खाद्यान्न को थोड़ा सा चखती भर है और कई बार तो वह भी नहीं.
कुछ लोगों को तो बरसों कोशिश करते हो गए पर कामधेनु मां ने उनके हाथ से भोजन स्वीकार नहीं किया है.
इस गाय की चाल ढ़ाल और स्वभाव में एक अजब सी गरिमा है. इसकी देहयष्टि भी अन्य गायों से बिल्कुल भिन्न है. इसे देखने पर लगता है जैसे यह हर चीज से निर्लिप्त हो.
हिन्दुओं का कोई त्यौहार हो अथवा पूर्णमासी या अमावस्या का दिन इस गौशाला में मेला सा लग जाता है.
लोग सपरिवार यहां आते हैं और गायों को अपने हाथों से फल, मिठाई, गुड़, रोटी, दलिया आदि खिलाते हैं. इसके अलावा रोजमर्रा में भी गौभक्तों का यहां आना लगा ही रहता है.
यहां आकर और कुछ समय बिताकर ब्रिगेडियर चौहान के इस कथन पर विश्वास हो जाता है की यह महातीर्थ है...


बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

हिन्दुओं में प्रचलित धारणाएं जो हिंदुत्व हैं ही नहीं

1. भगवान से डरना - सनातन में भगवान से डरने जैसी कोई बात है ही नहीं. सनातन अवधारणा कण कण में ईश्वर का अस्तित्व मानती है और विश्वास करती है की ऐसा कुछ भी नहीं जिसमे ईश्वर ना हो. ऐसे में ईश्वर से डरना बेमानी है क्योंकि ईश्वर कोई अलग अस्तित्व नहीं है बल्कि जो कुछ भी है वह ईश्वर है. श्रीकृष्ण ने इस बात को गीता में बहुत अच्छी तरह परिभाषित किया है. ईश्वर से डरना ईसाई और इस्लामिक धारणाएं हैं. ईसाईयत में तो मनुष्य को जन्मजात पापी माना गया है.

2. किसी की मृत्यु पर शोक सन्देश में RIP (Rest In Peace) लिखना भी हिन्दू मान्यता नहीं है. यह ईसाई, इस्लाम और यहूदी जैसे एक ही जन्म को मानने वाले धर्मों की मान्यता है. इन धर्मों में माना जाता है की मनुष्य का केवल एक ही जन्म होता है और मृत्यु के बाद कयामत के दिन तक व्यक्ति को कब्र में अपने फैसले के लिए इन्तजार करना पड़ता है. जबकि सनातन पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और मृत्यु उपरान्त जीव की प्रेत, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म अथवा मोक्ष स्थिति की चर्चा करता है. किसी की मृत्यु उपरान्त दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी जाती है और उसकी सद्गति (मोक्ष) की कामना की जाती है.

3. हिंदुत्व में जो कुछ भी पौराणिक है वह इतिहास है. इस मान्यता में मिथक जैसा कुछ नहीं होता. राम, कृष्ण, देवी देवता, ऋषि मुनि, राक्षस, दानव सब इतिहास हैं ना की काल्पनिक मिथक. जबकि पश्चिमी देवी देवता मिथक कहलाते हैं और क्योंकि उनमें कल्पना का समावेश होता है. 

4. हिंदुत्व में मूर्ति पूजा किसी प्रतिमा या छवि की पूजा नहीं है ना ही यह प्रतीकों की पूजा है. देव प्रतिमा को विग्रह कहा गया है. विग्रह का अर्थ होता है फैलाना, यह उस देवी देवता का विस्तार है जिसे हम पूजना चाहते हैं. देवी देवता के उस विस्तार को जिसे हम देख पाते हैं विग्रह कहलाता है.

5. श्री हनुमान और श्री गणेश जैसे देवताओं को अंग्रेजी अनुवाद में मंकी गॉड और एलिफैंट गॉड कहना बहुत गलत बात है. यह अनुवाद इन श्रद्धा चरित्रों से न्याय नहीं करता इससे बचना चाहिए. इसकी जगह इनके श्री युक्त नाम ही प्रयोग करने चाहिए.

6. हिन्दुओं के मंदिर प्रार्थना भवन या prayer Hall नहीं हैं. वहां पूजा की जाती है और आशीष मांगे जाते हैं. प्रार्थना करना सनातन शैली नहीं है इसके बदले हिन्दू भगवान से आशीष मांगता है. बड़े बुजुर्ग और गुरुजन भी छोटों को आशीष ही देते हैं. हिन्दू अपने मंदिर से कभी खाली हाथ भी नहीं आता मंदिर छोटा हो या बड़ा वह भगवान का चरणामृत और प्रसाद जरूर पाता है. 

7. हिन्दुओं में त्यौहार और उत्सव दीप जलाकर मनाये जाते हैं मोमबत्ती बुझा कर नहीं. सनातन ने अग्नि को भी देवता माना है और उसे फूंक मारकर बुझाना अशिष्टता है. तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्घोष हिंदुत्व की विशेषता है.

8. हिंदुत्व धार्मिकता और भौतिकता की बात भी नहीं करता क्योंकि वह सभी कुछ दिव्य मानता है. अंग्रेजी के Religion, Religious और Materialistic जैसे शब्दों का हिंदुत्व में कोई स्थान नहीं है. धर्म हिंदुत्व में व्यक्तिगत बात है और धार्मिकता जैसा कुछ नहीं होता. धर्म को सनातन में कर्तव्य भी कहा गया है. आज जिसे धर्म कहा जाता है सनातन उसे सम्प्रदाय कहता है. सनातन ऋषि मुनियों ने आत्मा के सन्दर्भ में अध्यात्म का जिक्र किया है जिसका अर्थ होता है स्वयं का अध्ययन.

9. अंग्रेजी शब्द Sin जिसका अर्थ पाप किया जाता है वह भी सनातन द्वारा वर्णित पाप शब्द का सही अर्थ स्पष्ट नहीं करता. सनातन में पूरा जोर धर्म के संपादन पर है. धर्म का अर्थ है देश, काल और परिस्थिति अनुसार सम्पादित किया गया सम्यक कर्म इसे कर्तव्य भी कहा गया है. जो भी धर्म नहीं है वह अधर्म है और अधर्म पाप का जनक है. इसके अलावा ग्लानि को भी पाप का परिणाम माना गया है.

10. सनातन के योग का अर्थ शारीरिक व्यायाम नहीं है जैसा की अंग्रेजी अर्थ Yoga में समझा जाता है. योग का अर्थ है मन का आत्मा से जुड़ाव. योग के प्रणेता ऋषि पतंजलि का सूत्र है 'योगश्च चित्तवृत्ति निरोध: यानि योग चित्त की वृत्तियों को रोकता है. चित्तवृत्ति मन के कार्यव्यापार को कहते हैं. योग इस कार्यव्यवहार के ठहराव में सहायक है. ऐसे ही ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद Meditation भी गलत है क्योंकि Meditation का अर्थ है आराम पाना. यह अंग्रेजी शब्द Medicine से निकला है जबकि ध्यान का अर्थ है कुछ ना होना, ध्यान कुछ करना नहीं बल्कि होना है मात्र होना. यह भाव और मन के पार की स्थिति है. इसे मात्र आराम देने वाला मानना हास्यास्पद है. 

                                               

सोमवार, 14 अगस्त 2017

किसने निकाला था भारत की आजादी का मुहूर्त

देश के नियंताओं ने देश की आजादी के लिये 15 अगस्त 1947 की शुरुआत यानी अर्धरात्रि को चुना.
क्योंकि इसके पीछे उनकी ज्योतिष के प्रति गहन आस्था थी.
उज्जैन के तत्कालीन महान ज्योतिषी पद्म भूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इस मुहूर्त को चुना था.
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद व्यास जी के बड़े भक्त थे. अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए 14 और 15 अगस्त की दो तारीखें तय की थीं. इन्हीं तारीखों में से दोनों ने अपना समय चुनना था.
दिलचस्प बात ये है की व्यास जी ने 1938 में ही अपने एक ज्योतिषीय लेख में भारत की स्वतंत्रता तिथी 15 अगस्त 1947 घोषित कर दी थी.
उनके अनुसार यह मुहूर्त स्थिर लग्न में था जिसके कारण भारत का लोकतंत्र सदा स्थिर रहेगा और आने वाले वर्षों में यह राष्ट्र विश्व का सिरमौर बनेगा.
व्यास जी ने गांधी वध भी 1924 में ही घोषित कर दिया था. उन्होंने एक लेख में लिखा था गांधी की स्वाभाविक मृत्यु नही होगी वे मारे जायेंगे उनकी हत्या एक ब्राह्मण करेगा.
ऐसे ही नेहरू का भी तमाम भविष्य व्यास जी ने खोलकर रख दिया था और वे कितने साल राज करेंगे यह भी आजादी से पहले ही बता दिया था तब नेहरू का कद बहुत छोटा था और लोगों को एकाएक इस बात पर विशवास नहीं हुआ था.
नेहरू भी व्यास जी से परामर्श लिया करता था लेकिन इस बात को छिपाया जाता था क्योंकि नेहरू ने अपनी छवि एक सेक्युलर की बना रखी थी.
लाल बहादुर शास्त्री द्वारा अमावस्या के दिन प्रधानमन्त्री पद की शपथ लेने को भी व्यास जी ने बहुत गलत बताया था.
शास्त्री जी भी व्यास जी को बहुत मानते थे पर उन्होंने बात हंसी में उड़ा दी. शास्त्री जी जब ताशकंद जाने लगे तब पंडित सूर्यनारायण व्यास जी ने 'हिंदी हिंदुस्तान' में एक लेख लिखा की शास्त्री जी ताशकंद से जीवित नहीं लौटेंगे. संपादक ने यह लेख छपने से रोक लिया और शास्त्री जी तक यह अनहोनी पहुंचाई.
शास्त्री जी बात को टाल गए. ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु के बाद अखबार ने इस टिप्पणी के साथ लेख छापा की यह लेख उन्हें शास्त्री जी की मृत्यु से पहले ही मिल चुका था.
मोरारजी देसाई के बारे में प्रचारित था की वह ज्योतिष पर बिलकुल विशवास नहीं करते लेकिन उन्होंने भी बंबई राज्य की स्थापना का मुहूर्त व्यास जी से निकलवाया था.
पंडित सूर्यनारायण व्यास जी से इंदिरा गांधी ने भी ज्योतिषीय परामर्श लिया था. व्यास जी ने इंदिरा गांधी और उनके दोनों पुत्रों की अप्राकृतिक मृत्यु के विषय में भी बता दिया था लेकिन इस बात को दफन कर दिया गया.
1936 में ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड अष्टम की भारत यात्रा अफवाहों पर भी व्यास जी ने स्पष्ट भविष्यवाणी कर दी थी की वे भारत नहीं आएंगे और उनकी गद्दी के दिन अब गिने चुने हैं.
ऐसा ही हुआ सम्राट भारत नहीं आये और कुछ ही दिन बाद एक अमेरिकन महिला लेडी सिम्पसन से विवाह करने से उठे विवाद में सम्राट को सिंहासन छोड़ना पड़ा.
इतना ही नहीं हिटलर भी व्यास जी का भक्त था और उनसे ज्योतिषीय परामर्श लेता था…

गुरुवार, 1 जून 2017

पंच तत्व संकट

पृथ्वी - जमीन बंजर पड़ी है और अगर उस पर खेती हो भी रही है तो वह रसायनों से दूषित है. 
जहां देखो वहां कंक्रीट का जंगल उगा है. कहीं पृथ्वी का कोई मोल नहीं तो कहीं वह स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान है. एक अदद घर बनाने के लिए आदमी को पृथ्वी का छोटा सा टुकड़ा तक मयस्सर नहीं. पृथ्वी तत्व लैंगिक और आधारभूत आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है. निर्विवाद सत्य है की आज जितनी लैंगिक लोलुपता दृष्टिगोचर हो रही है और आधारभूत आवश्यकताओं के जो संघर्ष मनुष्य कर रहा है वह पीड़ादाई है.
जल - जल संकट आज एक बड़ा संकट है. नदियां मनुष्य से हाथ जोड़ पनाह मांग रही हैं. नदियों का ईको सिस्टम जगह जगह बांध बना तालाब में बदल गया है. जल के लिए सर्वत्र हाहाकार है. जल महंगे दामों बाजार में बिक रहा है. मन वस्तुत: जल ही है, जल की विषाक्तता ने मन को विषाक्त कर दिया है. आज जितने कलुषित और निकृष्ट मनों का दर्शन हो रहा है वह अभूतपूर्व है.
वायु - तमाम तरह के औद्योगिकीकरण से वायु पर्याप्त दूषित हो चुकी है. वायु का गुण है की वह विरल प्रवाहक है. सो वह जगत के संताप भी ढोती है. जगत आज इतना दुखी है की हवाओं में ही दर्द घुला है. साथ ही 100 में से 90 व्यक्ति वातविकार ग्रस्त हैं.
अग्नि - सर्वाधिक असंतुलन आज अग्नि का ही है. भले वह जठराग्नि हो या फिर कामाग्नि. आज अग्नि सम्यक व्यवहार नहीं कर रही. कहीं उसका स्वाभाव अतिअल्प है तो कहीं वह दावानल बनी हुई है. आज जितने प्राकृतिक और अप्राकृतिक अग्निकांड दर्ज किये जा रहे हैं उतने मानवीय इतिहास में कभी नहीं देखे गए.
आकाश - आकाश यानि अवकाश. सभी कर्म अवकाश होने पर ही सम्पादित होते हैं. आज किसी के पास अवकाश नहीं है, केवल उतना ही अवकाश है जितने में उदरपूर्ति हो सके या फिर वासना शांत की जा सके. धैर्य भी आकाश तत्व है. लेकिन आज धैर्य की सर्वाधिक कमी महसूस की जाती है. कोई कुछ जरा सा विरोध में बोल दे व्यक्ति तुरंत आपा खो देता है. आकाश तत्व बुरी तरह पीड़ित हो चुका है.
कहते हैं युग परिवर्तन के लिए पंच तत्वों का पीड़ित होना आवश्यक है. पुनर्जन्म तभी होता है जब पंच तत्व पीड़ित हो भस्मीभूत हो जाते हैं...

बुधवार, 31 मई 2017

आकर्षण का नियम / कितना सच कितना झूठ


आजकल 'आकर्षण के नियम Law Of Attraction' की चर्चा जोरों पर है. इससे सम्बंधित पुस्तकों, वीडियो और वर्कशॉप्स की मानो बाढ़ सी आई हुई है. मानवीय लालच और लालसा को लुभाता इसका बड़ा भारी बाजार खड़ा हो गया है.
इस नियम को एक ऐसी कुंजी बताया जा रहा है जिसके द्वारा कुछ भी असंभव नहीं. इसके प्रयोग से धन दौलत, रुतबा, प्रेम और शांति सब आपके चरणों में लोटने लगेंगे.
यह नियम अहसासों पर आधारित है.
जैसे भाव होंगे वैसा ही फल मिलेगा. विशेषज्ञों द्वारा इसे तीन चरणों में बांटा गया है. पहले में इच्छित वस्तु की कामना यानि उसका लक्ष्य निर्धारण या फिर कहें की उसकी मानसिक कल्पना. दूसरे चरण में भाव करना की वह वस्तु या लक्ष्य आपको प्राप्त हो गया है और तीसरे में अस्तित्व को धन्यवाद देना, अहोभावपूर्ण होना.
तकनीकी रूप से इस नियम की प्रयोग विधि में कोई कमी दिखाई नहीं देती. यह बेहद सरल प्रतीत होता है. फिर क्या कारण हैं की इसके अभ्यासी को समुचित फल प्राप्त नहीं होता, और शायद कभी होगा भी नहीं.
क्योंकि प्रत्येक का अपना प्रारब्द्ध है.
आकर्षण का नियम अपना कार्य करता है लेकिन इसका फैलाव इतना अधिक है की यह व्यक्ति के वर्तमान जीवन का अतिक्रमण कर जाता है. सनातन मान्यता जन्म जन्मांतर में विश्वास करती है. पूर्वजन्म इस मान्यता में एक सर्वमान्य सत्य है. साथ ही यह भी कहा जाता है की प्रत्येक वर्तमान जन्म अतीत के जन्म का ही प्रतिफल है. अनंत जन्मों से गुजरती हुई यह आत्मा की वह विकास यात्रा है जिसमे उसे अंतत: परमात्मा में लीन होना है.
व्यक्ति सामाजिक मानदंडों पर सुख दुःख और सफलता असफलता की परिभाषा तय करता है. जबकि अंतरात्मा जिसे अवचेतन मन भी कहा गया है इन सबकी कुछ और ही परिभाषा लिये होती है.
सनातन दर्शन कहता है की जीव का प्रत्येक जन्म उसका स्वयं का चुनाव है. स्वयं के विकास के लिए वह अमीर, गरीब, राजा, रंक, अपाहिज, सक्षम, अक्षम, स्त्री, पुरुष किसी भी रूप में जन्म लेता है. परमात्मा से मिलन की अपनी अनेक जन्मों की यात्रा में लिया गया प्रत्येक जन्म उसकी स्वयं की ही इच्छा है भले ही वह कितना भी दुखद और यंत्रणापूर्ण क्यों ना हो.
इस प्रकार विभिन्न अनुभवों से जीवात्मा स्वयं को परिपक्व करती हुई एक दिन निर्विकार हो मोक्ष को प्राप्त हो जाती है. और इस सम्पूर्ण यात्रा में अस्तित्व उसकी चाह के साथ सहयोग करता है.
अब यह आकर्षण का नियम ही है जो की जीवात्मा की जीवन यात्रा में उसके साथ चलता है.
जब वर्तमान जन्म में जीवात्मा ने एक निश्चित आकार प्रकार संकल्पित कर जन्म ले लिया है तो कहा जा सकता है की अब उसमे कोई फेरबदल संभव नहीं. जो फेर बदल जैसा दिखाई दे रहा है वह उसी संकल्पना का ही हिस्सा है. इसे Divine Plan या दैवीय इच्छा भी कहा जाता है.
ज्योतिष भी इसी बात की पुष्टि करता है.
ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक का व्यक्तित्व, कल्पना, पराक्रम, आनंद, संघर्ष और प्राप्तियां भिन्न होते हैं.
और यह सब जन्म जन्मांतर तक फैली विस्तृत यात्रा की वह वर्तमान अभिव्यक्ति होते हैं जिन्हें जीवात्मा ने आकर्षण द्वारा आयोजित किया है…

बुधवार, 24 मई 2017

काल भ्रम

नगर में डुग्गी पिट रही थी सावधान...
सब नगरजन ध्यान से सुनिए कल महामंडप में आचार्य सत्यकीर्ति का व्याख्यान होगा, सम्राट भी उनके श्रीचरणों में उपस्थित रहेंगे. आप सब भी उपस्थित होकर जीवन सुफल कीजिये.

सुकांत ने भी इस घोषणा को सुना और निश्चय किया की वह व्याख्यान सुनने जायेगा. सुकांत एक गरीब लेकिन शिक्षित युवक था आध्यात्मिक वार्ताएं और वादविवाद उसकी रूचि का विषय थे. आजकल सनातन धारा पर पड़ रहे विपरीत विचारों से वह कुछ उद्वेलित रहता था. उसने महसूस किया था सम्राट भी इन विधर्मी विचारों के गहरे प्रभाव में थे.

नियत समय पर व्याख्यान शुरू हुआ महामंडप खचाखच भरा था. आचार्य सत्यकीर्ति वर्तमान में जीने की कला पर बोल रहे थे.
उन्होंने समझाया ना अतीत ना भविष्य केवल वर्तमान, वर्तमान में जीना ही धर्म है भगवत्ता है. अतीत जा चुका है भविष्य अभी आया नहीं हमारे पास केवल वर्तमान है और इसमें रमना ही ध्यान है योग है निर्वाण है.
लोग मंत्रमुग्ध होकर जीने की कला सीख रहे थे.

अल्पकाल में ही आचार्य के विचारों का प्रभाव राज्य में हो चला था यहां तक की सम्राट भी उनके बड़े प्रशंसक थे और राज्य भर में उनके व्याख्यान और उपदेश आयोजित करवाने लगे थे. सामंतों और श्रेष्ठियों में आचार्य सत्यकीर्ति का शिष्य बनने की होड़ सी लगी थी.
माना जाता था कि चेतना का परम विस्फोट उनमे हो गया है और उन्होंने सत्य पा लिया है.

व्याख्यान समाप्ति पर उपस्थित लोगों से कहा गया यदि कोई जिज्ञासा हो तो आचार्य से पूछ लें. सुकांत ने हाथ उठा कर प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी.
आचार्य ने सिर हिला कर हामी भरी. सुकांत खड़ा हुआ और बोला आचार्य क्या आप वास्तव में मानते हैं कि वर्तमान होता है. लोग सुकांत का प्रश्न सुनकर हंसने लगे सामंतों और श्रेष्ठियों के मुख पर भी उपहास का भाव आ गया.
आचार्य ने कहा हां मैं मानता हूं वर्तमान होता है.
सुकांत ने दूसरा प्रश्न किया कितना बड़ा होता है वर्तंमान, जैसे अतीत और भविष्य पर्याप्त लम्बे हैं ऐसे ही वर्तमान कितना बड़ा होता है.
आचार्य बोले वर्तमान सूक्ष्म होता है.

सुकांत ने फिर पूछा कितना सूक्ष्म आखिर उसका कोई आधार बिंदु तो होगा जहां ठहरा जा सके.
आचार्य ने उलझन भरी निगाहों से सुकांत को देखा इधर लोगों के चेहरों पर से भी हंसी गायब हो गई और वह अचरज से कभी सुकांत और कभी आचार्य को ताकने लगे.

सुकांत बोला आपके अनुसार अतीत और भविष्य के मध्य रमण ही भगवत्ता है तो फिर उस मध्य में अवकाश होना चाहिए जिसमें रमा जा सके कृपया उस अवकाश को चिन्हित करें.

आचार्य के माथे पर पसीने की बूंदे छलछला आईं अटकते से बोले वह बोध का पल है उसे मापा नहीं जा सकता.
सुकांत बोला इसका अर्थ हुआ वह अतीन्द्रिय है और जो अतीन्द्रिय है वह समय से पार है. यानि जब हम वर्तमान में होंगे तब समय होगा ही नहीं ना अतीत होगा ना भविष्य सभी कुछ सापेक्ष होगा, जो होगा वह शुद्ध वर्तमान होगा.
जैसे गणित में दो सामानांतर रेखाएं अनंत पर मिलती हैं शायद वैसे ही अतीत और भविष्य भी अनंत में ही वर्तमान से मिलते हैं आचार्य.
क्या यह सच नहीं की मनुष्य के पास केवल अतीत और भविष्य होते हैं वर्तमान कभी होता ही नहीं. वर्तमान एक सम्भावना है पारलौकिक सम्भावना.  
आचार्य के मुंह से बोल नहीं फूटा.

उपस्थित जनसमूह विस्मित था और सम्राट आश्चर्य से आचार्य सत्यकीर्ति की ओर देख रहे थे.
आचार्य के मुख पर विषाद की घनी छाया थी.

सोमवार, 22 मई 2017

बकरा

सतपाल की निगाह बार बार अलमारी की ओर जाती फिर वह खिड़की से बाहर झांकने लगता.
आज होली है लेकिन गली में कोई चहल पहल अभी तक शुरू नहीं हुई. कमाल के बच्चे हैं आजकल के, रंग खेलने का भी उत्साह नहीं हम जब छोटे थे तो मुंह अंधेरे ही शुरू हो जाते थे.
बच्चे शुरू करें तो धीरे धीरे बड़े भी घर से निकलेंगे. आठ बज गए लेकिन त्यौहार का कोई माहौल ही नहीं हद है भई.

सतपाल ने कल ही व्हिस्की का कोटा लाकर अलमारी में रख दिया था.
होली का त्यौहार है पता नहीं कौन घर आ जाए, सामान हो तो शर्मिंदगी महसूस नहीं होती एक यही दिन तो है जब आदमी सुबह से और खुलकर पीता है वरना तो साल भर अदब और लिमिट की ही चलती है.

आखिरकार वह उठा और अलमारी से बोतल निकाल ली, एक मार लिया जाए तो मूड बन जायेगा फिर आराम से लेते रहेंगे. पता नहीं दिन भर किस किस के साथ क्या क्या पीना पड़ेगा कोई बीयर पिलाता है कोई व्हिस्की तो कोई रम होली पर सब घालमेल हो जाता है.

पैग खत्म होते होते गली से बच्चों का छिटपुट शोर आने लगा, बच्चों की होली शुरू हो गई थी.
सतपाल ने एक स्माल और बना लिया और चुस्कियां लेता हुआ खिड़की से बच्चों की होली देखने लगा. इतने में पत्नी प्लेट में कुछ खाने का सामान ले आई और उसके हाथ में गिलास देखकर बोली हो गए शुरू मुझे पता था, और हां लिमिट में पीना और साथ में कुछ खाते रहना.
सतपाल ने गुलाल निकाला और पत्नी के गालों पर लगाते हुए उसे हैप्पी होली बोल दिया. तभी कॉलबेल बजी, दरवाजा खोला तो देखा पड़ोस के गुप्ता जी और उनकी श्रीमती जी थे. दोनों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया.
एक दूसरे को रंग गुलाल लगाने के बाद सतपाल ने गुप्ता जी से फरमाइश पूछी तो उन्होंने झिझकते हुए अपनी श्रीमती जी की ओर देखा. सतपाल मामला भांपते हुए तुरंत बोला अजी होली की तो छूट होती है एक यही दिन तो हमारा है बाकी सब तो इनके ही हैं.
पत्नियों ने मुस्कुरा कर हामी भरी.
पांच मिनट बाद दोनों जाम टकराते हुए चीयर्स बोल रहे थे.

गली में अब रंगे पुते बड़े भी होली खेलते दिखने लगे.
तभी बाहर से आवाज आई अरे भाई सतपाल बाहर निकलो होली है. जल्दी से गिलास खाली कर सतपाल और गुप्ता जी गुलाल का पैकेट थामे बाहर लपके.

धीरे धीरे त्यौहार जोश और उन्माद की ओर बढ़ने लगा.
यहां वहां होली खेलते पीते खाते आठ दस पुरुषों का झुण्ड गली के बाहर पार्क में आ बैठा. सब सुरूर में थे. बच्चे भी पार्क में टोलियां बनाकर उत्पात मचाने लगे. बीच बीच में किसी की पत्नी आती और इन पुरुषों पर गुलाल या रंग उंडेल कर हंसती हुई अपने टोले में जा बैठती.

हवा में मानों मस्ती घुली थी, कोई ढोलक ले आया तो किसी ने रंगीन पटाखे की लड़ी में आग लगा दी हर तरफ हुड़दंग का माहौल था.
पीने खाने का सामान सब पार्क में ही आ गया. हंसी, मजाक और चुटकुलों के बीच पीना पिलाना चलता रहा. पीते पीते दोपहर चढ़ आई और सतपाल को तगड़ा नशा हो गया.

बातों बातों में खाने पर बात चल निकली. चौहान साहब बोले हम तो भाई आज बकरा खाएंगे, हमारी तो खानदानी परंपरा है होली पर घर में बकरा जरूर बनता है. सुबह ही बना लिया था.
दो एक और लोगों ने भी हामी भरी की उनके घर भी होली पर मटन बनता है वे भी आज मीट खाएंगे.

सतपाल के मुंह में पानी आ गया. मन में स्वादिष्ट तरीदार मीट के चित्र उभरने लगे. मीट की खुश्बू रह रह कर उसके नासापुटों से टकराने लगी.
अचानक उसे अहसास हुआ की उसे तेज भूख लगी है. बहुत दिन हो गए मीट नहीं खाया आज वह भी मीट खायेगा.
उसने हाथ में पकड़ी बीयर की बोतल मुंह से लगाई और गटागट दो बड़े घूंट भरे, मीट खाने का संकल्प और गहरा हो गया.
सतपाल ने नशे में थरथराती आवाज में पूछा आज क्या मीट की दुकान खुली होगी, आज तो होली है. चौहान साहब ने बताया अरे आज ही तो सबसे ज्यादा मीट बिकता है. दुकान जरूर खुली होगी. आज के दिन और दिनों से तिगुनी चौगुनी सेल होती है.

सतपाल ने एक ही सांस में बीयर खत्म की और झूमते हुए बोला अच्छा भाईयों मैं चला मीट लेने. चौहान साहब बोले अरे भाई इस हालत में कहां जाओगे आज हमारी दावत कबूल कर लो या कहो तो टिफिन घर भेजवा दें. और लोगों ने भी रोकने की कोशिश की पर सतपाल ने किसी की एक नहीं सुनी उसके दिमाग पर नशा बुरी तरह हावी था.
थोड़ी दूर ही मेन रोड पर धरमू कसाई की मां काली झटका शॉप थी.
लड़खड़ाते हुए सतपाल धरमू की दुकान पर पहुंचा तो वह अपना मीट काटने वाला लकड़ी का कुन्दा धो रहा था. दुकान के बाहर एक बकरा बंधा था.
सतपाल ने धरमू से मीट की मांग की तो धरमू ने बताया मीट तो ख़त्म हो गया. आज चार बकरों का एस्टीमेट लगाया था पर तीन तक ही ग्राहकी चुक गई. यह जो बाहर बंधा है यह कल कटेगा. थोड़ा बहुत जो बचा था वह नौकर ले गया.
होली पर दोपहर तक ही ग्राहकी होती है इसके बाद कोई नहीं आता.
सुनकर सतपाल का पारा चढ़ गया चीख कर बोला ऐसे कैसे ख़त्म हो गया हमने तो लिया ही नहीं और खत्म भी हो गया. धरमू भी ताव खाकर बोला आपको पहले आना था लोग सुबह ही ले जाते हैं आज के दिन दुकान सुबह पांच बजे खुल जाती है, जाओ अब कल आना.
थरथराती आवाज में सतपाल बोला यह जो बाहर बंधा है इसे काट दे.

ऐसे कैसे काट दूं तुम अकेले के लिए बीस किलो का बकरा काट दूं कल आना अब तो मैंने अड्डा भी धो दिया है. नशे में विवेक खो चुके सतपाल के अंदर जलती क्रोधाग्नि में इस इंकार ने घी का काम किया उसकी आंखों में खून उतर आया.

उसने लपक कर धरमू की बगल में रखा छुरा उठाया और बाहर भागा.
ले तू नहीं काटेगा तो मैं काटता हूं आज तो घर पे बकरा बनकर रहेगा. धरमू भी कूद कर उसके पीछे भागा और छुरा छीनने की कोशिश करने लगा.
इस छीना झपटी में कब छुरा सतपाल के गले की मुख्य नस पर जा लगा पता ही नहीं चला. सब पलक झपकते बिजली की तरह हो गया.
सतपाल के गले से खून का फव्वारा छूटा और वह पछाड़ खा बकरे की बगल में जा गिरा. धरमू के होश उड़ गए उसने तुरंत दुकान का शटर गिराया और बन्दूक से छूटी गोली की तरह भाग खड़ा हुआ.

रंग गुलाल से पुता सतपाल खून के तालाब में मरा पड़ा था और खूंटे से बंधा बकरा मैंssssss मैंssssss की कातर गुहार मचाये था.