बुधवार, 24 मई 2017

काल भ्रम

नगर में डुग्गी पिट रही थी सावधान...
सब नगरजन ध्यान से सुनिए कल महामंडप में आचार्य सत्यकीर्ति का व्याख्यान होगा, सम्राट भी उनके श्रीचरणों में उपस्थित रहेंगे. आप सब भी उपस्थित होकर जीवन सुफल कीजिये.

सुकांत ने भी इस घोषणा को सुना और निश्चय किया की वह व्याख्यान सुनने जायेगा. सुकांत एक गरीब लेकिन शिक्षित युवक था आध्यात्मिक वार्ताएं और वादविवाद उसकी रूचि का विषय थे. आजकल सनातन धारा पर पड़ रहे विपरीत विचारों से वह कुछ उद्वेलित रहता था. उसने महसूस किया था सम्राट भी इन विधर्मी विचारों के गहरे प्रभाव में थे.

नियत समय पर व्याख्यान शुरू हुआ महामंडप खचाखच भरा था. आचार्य सत्यकीर्ति वर्तमान में जीने की कला पर बोल रहे थे.
उन्होंने समझाया ना अतीत ना भविष्य केवल वर्तमान, वर्तमान में जीना ही धर्म है भगवत्ता है. अतीत जा चुका है भविष्य अभी आया नहीं हमारे पास केवल वर्तमान है और इसमें रमना ही ध्यान है योग है निर्वाण है.
लोग मंत्रमुग्ध होकर जीने की कला सीख रहे थे.

अल्पकाल में ही आचार्य के विचारों का प्रभाव राज्य में हो चला था यहां तक की सम्राट भी उनके बड़े प्रशंसक थे और राज्य भर में उनके व्याख्यान और उपदेश आयोजित करवाने लगे थे. सामंतों और श्रेष्ठियों में आचार्य सत्यकीर्ति का शिष्य बनने की होड़ सी लगी थी.
माना जाता था कि चेतना का परम विस्फोट उनमे हो गया है और उन्होंने सत्य पा लिया है.

व्याख्यान समाप्ति पर उपस्थित लोगों से कहा गया यदि कोई जिज्ञासा हो तो आचार्य से पूछ लें. सुकांत ने हाथ उठा कर प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी.
आचार्य ने सिर हिला कर हामी भरी. सुकांत खड़ा हुआ और बोला आचार्य क्या आप वास्तव में मानते हैं कि वर्तमान होता है. लोग सुकांत का प्रश्न सुनकर हंसने लगे सामंतों और श्रेष्ठियों के मुख पर भी उपहास का भाव आ गया.
आचार्य ने कहा हां मैं मानता हूं वर्तमान होता है.
सुकांत ने दूसरा प्रश्न किया कितना बड़ा होता है वर्तंमान, जैसे अतीत और भविष्य पर्याप्त लम्बे हैं ऐसे ही वर्तमान कितना बड़ा होता है.
आचार्य बोले वर्तमान सूक्ष्म होता है.

सुकांत ने फिर पूछा कितना सूक्ष्म आखिर उसका कोई आधार बिंदु तो होगा जहां ठहरा जा सके.
आचार्य ने उलझन भरी निगाहों से सुकांत को देखा इधर लोगों के चेहरों पर से भी हंसी गायब हो गई और वह अचरज से कभी सुकांत और कभी आचार्य को ताकने लगे.

सुकांत बोला आपके अनुसार अतीत और भविष्य के मध्य रमण ही भगवत्ता है तो फिर उस मध्य में अवकाश होना चाहिए जिसमें रमा जा सके कृपया उस अवकाश को चिन्हित करें.

आचार्य के माथे पर पसीने की बूंदे छलछला आईं अटकते से बोले वह बोध का पल है उसे मापा नहीं जा सकता.
सुकांत बोला इसका अर्थ हुआ वह अतीन्द्रिय है और जो अतीन्द्रिय है वह समय से पार है. यानि जब हम वर्तमान में होंगे तब समय होगा ही नहीं ना अतीत होगा ना भविष्य सभी कुछ सापेक्ष होगा, जो होगा वह शुद्ध वर्तमान होगा.
जैसे गणित में दो सामानांतर रेखाएं अनंत पर मिलती हैं शायद वैसे ही अतीत और भविष्य भी अनंत में ही वर्तमान से मिलते हैं आचार्य.
क्या यह सच नहीं की मनुष्य के पास केवल अतीत और भविष्य होते हैं वर्तमान कभी होता ही नहीं. वर्तमान एक सम्भावना है पारलौकिक सम्भावना.  
आचार्य के मुंह से बोल नहीं फूटा.

उपस्थित जनसमूह विस्मित था और सम्राट आश्चर्य से आचार्य सत्यकीर्ति की ओर देख रहे थे.
आचार्य के मुख पर विषाद की घनी छाया थी.

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