उप्लब्द्धियां कर्म से होती हैं या विचार से.
यदि आकर्षण के नियम की चर्चा करें तो वह विचार को मानता है और कहता है कर्म बहुत गौण चीज है और विचार का बाई प्रॉडक्ट है.
यदि श्रीमद्भगवद गीता का सार लें तो कर्मफल के प्रति अनासक्ति और निष्काम कर्म का सन्देश मिलता है जो की एक विशेष वैचारिक स्थिति में ही संभव है.
आदि शंकराचार्य तो बहुत ही स्पष्टता से कर्म के मुकाबले विचार को श्रेष्ठ कहते हैं -
चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मकोटिभि:।।
(आदि शंकराचार्य, विवेकचूड़ामणि, 1/11)
'कर्म चित्त शुद्धि के लिए है ना की वस्तुपलब्द्धि के लिए, वस्तु सिद्धि विचार से होती है करोड़ों कर्मों से भी कुछ नहीं होता'.
ऐसे ही भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं -
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
(गीता, 6/5)
'मनुष्य मन की सहायता से अपना उद्धार करे और नीचे ना गिरे, मन मित्र भी है और शत्रु भी'.
यहां यह कहना उपयुक्त होगा की मन ही विचार है और विचार ही मन. इसीलिये अमनिय अवस्था को निर्विचार अवस्था भी कहा जाता है.
लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में क्यों कह रहे हैं -
सकल पदारथ एहि जग माहिं।
करमहीन नर पावत नाहिं।।
(गोस्वामी तुलसीदास)
'इस जगत में समस्त पदार्थ उपलब्द्ध हैं लेकिन कर्महीन व्यक्ति को वो नहीं मिलते'.
अब यहां दो बिंदु आते हैं कर्म और अकर्म. अकर्म क्या होता है क्या कर्म ना करना अकर्म है. नहीं, वास्तव में अकर्म जैसी कोई स्थिति व्यक्ति के जीवन में नहीं होती. कुछ ना करना भी कर्म है निद्रा भी एक कर्म है. तो फिर करमहीन किसे कहा गया है. करमहीन विचारहीनता की वह स्थिति है जहां विचार इतना अस्पष्ट है की कर्म रुपी बाई प्रॉडक्ट तक निर्मित नहीं हो पा रहा है. विचारहीनता ही करमहीनता है.
इसलिए कहा जा सकता है विचार वह उत्प्रेरक शक्ति है जिसके आलोक में कर्म स्व:स्फूर्त संपन्न होता है...
यदि आकर्षण के नियम की चर्चा करें तो वह विचार को मानता है और कहता है कर्म बहुत गौण चीज है और विचार का बाई प्रॉडक्ट है.
यदि श्रीमद्भगवद गीता का सार लें तो कर्मफल के प्रति अनासक्ति और निष्काम कर्म का सन्देश मिलता है जो की एक विशेष वैचारिक स्थिति में ही संभव है.
आदि शंकराचार्य तो बहुत ही स्पष्टता से कर्म के मुकाबले विचार को श्रेष्ठ कहते हैं -
चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तुपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मकोटिभि:।।
(आदि शंकराचार्य, विवेकचूड़ामणि, 1/11)
'कर्म चित्त शुद्धि के लिए है ना की वस्तुपलब्द्धि के लिए, वस्तु सिद्धि विचार से होती है करोड़ों कर्मों से भी कुछ नहीं होता'.
ऐसे ही भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं -
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैव ह्रात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
(गीता, 6/5)
'मनुष्य मन की सहायता से अपना उद्धार करे और नीचे ना गिरे, मन मित्र भी है और शत्रु भी'.
यहां यह कहना उपयुक्त होगा की मन ही विचार है और विचार ही मन. इसीलिये अमनिय अवस्था को निर्विचार अवस्था भी कहा जाता है.
लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी मानस में क्यों कह रहे हैं -
सकल पदारथ एहि जग माहिं।
करमहीन नर पावत नाहिं।।
(गोस्वामी तुलसीदास)
'इस जगत में समस्त पदार्थ उपलब्द्ध हैं लेकिन कर्महीन व्यक्ति को वो नहीं मिलते'.
अब यहां दो बिंदु आते हैं कर्म और अकर्म. अकर्म क्या होता है क्या कर्म ना करना अकर्म है. नहीं, वास्तव में अकर्म जैसी कोई स्थिति व्यक्ति के जीवन में नहीं होती. कुछ ना करना भी कर्म है निद्रा भी एक कर्म है. तो फिर करमहीन किसे कहा गया है. करमहीन विचारहीनता की वह स्थिति है जहां विचार इतना अस्पष्ट है की कर्म रुपी बाई प्रॉडक्ट तक निर्मित नहीं हो पा रहा है. विचारहीनता ही करमहीनता है.
इसलिए कहा जा सकता है विचार वह उत्प्रेरक शक्ति है जिसके आलोक में कर्म स्व:स्फूर्त संपन्न होता है...


























