शुक्रवार, 10 जून 2016

अम्मा

वो दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट बहुत प्रसिद्द था.
हमेशा ग्राहकों से भरा रहता.
इस रेस्टोरेंट की किचन में महिलायें भी काम करती थीं. 
एक अधेड़ उम्र की दक्षिण भारतीय महिला किचन की हेड थी. सभी रेसिपीज उसी के द्वारा सेट की गई थीं.
कर्मचारी उसे अम्मा कह कर बुलाते थे.
अम्मा दिन भर किचन में अपने सहयोगियों के साथ व्यंजन बनाने में लगी रहती.
गुणवत्ता के साथ त्वरित सेवा यही रेस्टोरेंट का ध्येय था.
एक दोपहर ग्राहकों का दबाव चरम पर था और बाहर भी कुछ लोग अपनी बारी के लिये प्रतीक्षारत थे. वेटर भाग भाग कर सर्विस दे रहे थे.
तभी रेस्टोरेंट का एक हेल्पर लड़का कुछ लिफ़ाफ़े लेकर किचन में घुसा.
एक क्षण को किचन में सन्नाटा सा छा गया. बर्तन बजने की आवाजें अचानक शांत हो गईं.
और फिर जैसे प्रलय आ गई.
अम्मा फर्श पर बर्तन पटक चीखती हुई किचन से बाहर निकली.
ग्राहकों को मानो सांप सूंघ गया.
अम्मा चीख रही थी - 'हद होती है बर्दाश्त की भी. भाड़ में जाये ऐसी नौकरी. इस बार भी कोई इनक्रीमेंट नहीं. शोषण की भी कोई सीमा है'.
'मुझे नहीं करनी यह गुलामों जैसी नौकरी'.
कहकर एप्रन फेंकती अम्मा रेस्टोरेंट से बाहर को भागी. 'ना इन्क्रीमेंट ना टाइम पर सेलरी सम्हालो अपनी धर्मशाला'.
तभी रेस्टोरेंट के पीछे ऑफिस से एक नौजवान बदहवास सा दौड़ता हुआ आया. यह रेस्टोरेंट का मालिक था.
उसने हेल्पर लड़के को गुस्से से देखा और चीखा - "यू इडियट ! मैं वो एनवलप्स तुझे शाम को देने को बोला था" और तेजी से अम्मा के पीछे बाहर भागा.
लोग बड़ी दिलचस्पी से यह नजारा देख रहे थे.
नौजवान अम्मा की अनुनय विनय कर मनाने की कोशिश करने लगा. पर अम्मा थी की टस से मस नहीं हो रही थी और काम ना करने की जिद पर अड़ी थी.
काफी देर यह सब चलता रहा.
लोगों के आश्चर्य की तब सीमा ना रही जब उन्होंने रेस्टोरेंट मालिक को कहते सुना "ओफ्फोह लोग देख रहे हैं. अब मान भी जाओ ना मम्मी".
और मम्मी पिघलते हुए बोली 'नालायक ! बिलकुल अपने पापा पर गया है'…

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