मैंने उसे
एक निश्चित
प्रकार दिया
उसने पलट कर
मुझे इच्छित
आकार दिया
सदा यही
होता है
अस्तित्व
चाहना को
देता है
प्राप्ति का यह
अद्भुत मंत्र है
क्रिया समान
प्रतिक्रिया का
तंत्र है
वैचारिक सार ही
वर्तमान रूप
बचा है
हमें हमारे
एहसासों ने
रचा है
कोई चाहता है
यदि तृप्त होना
तो जरुरी है
अहोभावपूर्ण होना
यही जिन्दगी का
मर्म है
यही वास्तविक
धर्म है...
एक निश्चित
प्रकार दिया
उसने पलट कर
मुझे इच्छित
आकार दिया
सदा यही
होता है
अस्तित्व
चाहना को
देता है
प्राप्ति का यह
अद्भुत मंत्र है
क्रिया समान
प्रतिक्रिया का
तंत्र है
वैचारिक सार ही
वर्तमान रूप
बचा है
हमें हमारे
एहसासों ने
रचा है
कोई चाहता है
यदि तृप्त होना
तो जरुरी है
अहोभावपूर्ण होना
यही जिन्दगी का
मर्म है
यही वास्तविक
धर्म है...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें