शुक्रवार, 10 जून 2016

मुक्ति

श्वेत शुभ्र निर्मल परकाश
झरता रहता मन आकाश
अंतस में पूरण अवकाश
छूट गए सब बंधन पाश

सहज सरल जीवन परकार
भस्म हुए सभी पंच विकार
ह्रदयकुंज उत्सव साकार
मृण्मय चिन्मय एकाकार

स्नेहसिक्त मधुमय परभाव
कृपा रूप अति कोमल भाव
दृष्टि करती नष्ट अभाव
निश्छल निश्चित प्रेम स्वभाव...



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