दिन भर जूता पहने
वो बहुत कष्ट पाता था
क्योंकि जूता काटता था
उसकी जिन्दगी में
कोई रंग नहीं था
कोई भी तो
उसके संग नहीं था
पत्नी बच्चे दोस्त
सबसे उपेक्षित
वो खुद से ही
खुद के सुख दुःख
बांटता था
मेरे पूछने पर की
तुम नया जूता
क्यों नहीं लेते
इसे बदल क्यों
नहीं देते
वो उदास होकर कहता
रात जब जूता
उतारता हूं
बड़ा ही सुख पाता हूं
बस एक यही सुख तो
जिन्दगी में बचा है
दुखों से चौतरफा
घिर जाने पर
सुख के इस एहसास को
मैंने खुद ही रचा है...
वो बहुत कष्ट पाता था
क्योंकि जूता काटता था
उसकी जिन्दगी में
कोई रंग नहीं था
कोई भी तो
उसके संग नहीं था
पत्नी बच्चे दोस्त
सबसे उपेक्षित
वो खुद से ही
खुद के सुख दुःख
बांटता था
मेरे पूछने पर की
तुम नया जूता
क्यों नहीं लेते
इसे बदल क्यों
नहीं देते
वो उदास होकर कहता
रात जब जूता
उतारता हूं
बड़ा ही सुख पाता हूं
बस एक यही सुख तो
जिन्दगी में बचा है
दुखों से चौतरफा
घिर जाने पर
सुख के इस एहसास को
मैंने खुद ही रचा है...

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