गुड़गांव गुरुग्राम शब्द का अपभ्रंश है.
गुरुग्राम गुड़गांव का वास्तविक नाम है. गुरुग्राम एक ऐतिहासिक स्थान है. इस शहर का सम्बन्ध महाभारत के कथानायकों से है.
गुरुग्राम वो भूमि है जो हस्तिनापुर राज्य द्वारा गुरु द्रोणाचार्य को गुरुकुल निर्माण के लिए दे दी गयी थी. जहां आज द्रोणाचार्य राजकीय महाविद्यालय स्थित है वहीँ पर गुरु द्रोणाचार्य का गुरुकुल और आश्रम स्थित था जहां पर की कौरव और पांडव शिक्षा पाते थे.
यहीं पर गुरुकुल से कुछ किलोमीटर दूर एकलव्य का गांव स्थित है. आज यह गांव खांडसा नाम से जाना जाता है. महाभारत में इस इलाके को खांडव वन पुकारा जाता था. इसी गांव और गुरुकुल के मध्य कहीं पर भील युवक एकलव्य का दायां अंगूठा द्रोणाचार्य द्वारा छल पूर्वक मांग लिया था. इस गांव में कुछ वर्ष पूर्व तक एकलव्य की समाधि स्थित थी जहाँ पर वर्ष में एक विशेष दिन देश भर से भील माथा टेकने आते थे. लेकिन बढ़ते शहरीकरण और जनसंख्या दबाव ने इस स्मृति चिन्ह को कब लील लिया पता ही नहीं चला. आज इसका नामोनिशां तक नहीं है.
द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी एक बहुत ही दयालु और परोपकारी महिला थी. उन्होंने जीते जी मानव कल्याण के इतने कार्य किये की लोगों ने उन्हें देवी मान लिया और वो मां शीतला का अवतार मानी जाने लगीं. आज भी मां शीतला का मंदिर गुरुकुल के पास स्थित है और कृपी मां शीतला के रूप में पूजी जाती हैं.
यहां भीम का अखाड़ा भी है. इसी अखाड़े में भीम मल्लयुद्ध लड़ते थे और अभ्यास करते थे. अखाड़े के साथ ही प्राचीन कुआं है. इस अखाड़े की एक विचित्र बात यह है की हजारों वर्ष बीतने के बाद भी इसकी मिटटी में घास नहीं जमती. इतना समय बीतने के बाद भी इसमें कभी घास का एक तिनका भी नहीं पनपा. शायद अखाड़े की मिटटी को संक्रमण रहित करने के लिए कुछ मिलाया जाता रहा हो जो की मिटटी की उर्वर शक्ति को नष्ट कर देता हो. इसके लिए तो मिटटी की जांच करने पर ही रहस्य उजागर हो सकता है.
और भी ना जाने यहाँ महाभारत कालीन कितने ही अवशेष थे जो देखते देखते काल के गाल में समा गए...
गुरुग्राम गुड़गांव का वास्तविक नाम है. गुरुग्राम एक ऐतिहासिक स्थान है. इस शहर का सम्बन्ध महाभारत के कथानायकों से है.
गुरुग्राम वो भूमि है जो हस्तिनापुर राज्य द्वारा गुरु द्रोणाचार्य को गुरुकुल निर्माण के लिए दे दी गयी थी. जहां आज द्रोणाचार्य राजकीय महाविद्यालय स्थित है वहीँ पर गुरु द्रोणाचार्य का गुरुकुल और आश्रम स्थित था जहां पर की कौरव और पांडव शिक्षा पाते थे.
यहीं पर गुरुकुल से कुछ किलोमीटर दूर एकलव्य का गांव स्थित है. आज यह गांव खांडसा नाम से जाना जाता है. महाभारत में इस इलाके को खांडव वन पुकारा जाता था. इसी गांव और गुरुकुल के मध्य कहीं पर भील युवक एकलव्य का दायां अंगूठा द्रोणाचार्य द्वारा छल पूर्वक मांग लिया था. इस गांव में कुछ वर्ष पूर्व तक एकलव्य की समाधि स्थित थी जहाँ पर वर्ष में एक विशेष दिन देश भर से भील माथा टेकने आते थे. लेकिन बढ़ते शहरीकरण और जनसंख्या दबाव ने इस स्मृति चिन्ह को कब लील लिया पता ही नहीं चला. आज इसका नामोनिशां तक नहीं है.
द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी एक बहुत ही दयालु और परोपकारी महिला थी. उन्होंने जीते जी मानव कल्याण के इतने कार्य किये की लोगों ने उन्हें देवी मान लिया और वो मां शीतला का अवतार मानी जाने लगीं. आज भी मां शीतला का मंदिर गुरुकुल के पास स्थित है और कृपी मां शीतला के रूप में पूजी जाती हैं.
यहां भीम का अखाड़ा भी है. इसी अखाड़े में भीम मल्लयुद्ध लड़ते थे और अभ्यास करते थे. अखाड़े के साथ ही प्राचीन कुआं है. इस अखाड़े की एक विचित्र बात यह है की हजारों वर्ष बीतने के बाद भी इसकी मिटटी में घास नहीं जमती. इतना समय बीतने के बाद भी इसमें कभी घास का एक तिनका भी नहीं पनपा. शायद अखाड़े की मिटटी को संक्रमण रहित करने के लिए कुछ मिलाया जाता रहा हो जो की मिटटी की उर्वर शक्ति को नष्ट कर देता हो. इसके लिए तो मिटटी की जांच करने पर ही रहस्य उजागर हो सकता है.
और भी ना जाने यहाँ महाभारत कालीन कितने ही अवशेष थे जो देखते देखते काल के गाल में समा गए...

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