बुधवार, 8 जून 2016

महरौली


मिहिर को पिता आदित्यदास ने भविष्यशास्त्र पढ़ाया था.
मिहिर जल्दी ही इस विद्या में इतने निपुण हो गये की उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के पुत्र की मृत्यु की भविष्यवाणी कर दी.
नियत तिथि पर रक्षा की अनेक कोशिशों के बावजूद युवराज की मृत्यु हो गई. 

मिहिर की अनूठी प्रतिभा और ज्ञान के चलते उन्हें कुछ समय बाद उज्जयिनी राज्य द्वारा सर्वोच्च सम्मान 'वराह' ( वरदान ) प्रदान किया गया. अब मिहिर वराह मिहिर कहलाने लगे.
धीरे धीरे वराह मिहिर की कीर्ति आसमान चूमने लगी.

कालांतर में सम्राट बुद्धगुप्त ने अपने परदादा सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की प्रशस्तियों को स्वर्ण स्तंभ पर उत्कीर्ण कराना चाहा और इसके लिये वराह मिहिर से भेंट की. मिहिर ने स्वर्ण स्तंभ का विचार तुरंत निरस्त कर दिया. क्योंकि इसे चोरों से भय रहता. इसके बदले उन्होंने लौह स्तंभ की अनुशंसा की.
सम्राट ने शंकित हो प्रश्न किया की लौह स्तंभ तो जंग के चलते कुछ ही वर्षों में जर्जर हो जायेगा.
मिहिर ने सम्राट को आश्वस्त किया की वे पिटवां लोहे का स्तंभ बनायेंगे और उस पर वज्र लेप करेंगे. यह अपने आप में बिलकुल नई विधा होगी और इस पर कभी जंग नहीं लगेगा.
साथ ही वराह मिहिर ने सम्राट से प्रार्थना की कि जहां लौह स्तंभ गाड़ा जायेगा वहीँ वे एक वेध मीनार और एक निश्चित परिक्षेत्र जिसमे सूर्य घड़ी और अन्य खगोलीय उपकरण स्थापित किये जा सकें स्थापित करना चाहेंगे.

सम्राट ने सहर्ष अनुमति प्रदान की और वराह मिहिर से इसके लिये आदर्श स्थल की जिज्ञासा प्रकट की.
मिहिर ने गणना कर आज की दिल्ली का महरौली इसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त स्थल चिन्हित किया. इस संपूर्ण योजना क्षेत्र को मिहिर के नाम पर 'मिहिरावली' नाम दिया गया.
वराह मिहिर की इस स्थापना गणना के आगे आज का विज्ञान भी नतमस्तक है.
आधुनिक भूकंप विशेषज्ञों के अनुसार महरौली विश्व का सबसे सुरक्षित भूकंप क्षेत्र है.

दुर्भाग्यवश इस महानिर्माण को विदेशी लुटेरों द्वारा लूट लिया गया और इसे अपनी उपलब्द्धि बता दिया गया.
आज की कुतुबमीनार किसी लुटेरे का निर्माण नहीं वरन भारत के सपूत वराह मिहिर का निर्माण है…

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