शुक्रवार, 10 जून 2016

चाणक्य और चंद्रगुप्त

आचार्य विष्णुगुप्त अपने शिष्य और सेवक शारंगरव को अपनी कृति 'अर्थशास्त्र' लिखवा रहे थे.
आचार्य बोलते जाते और शारंगरव लिखता जाता.
आचार्य ने अपने दूसरे शिष्य मगध सम्राट चंद्रगुप्त को भी बुलावा भेजा हुआ था. 
किसी कारणवश वे चंद्रगुप्त पर क्रुद्ध थे.
सुखस्य मूलं धर्मः , धर्मस्य मूलं अर्थः
अर्थस्य मूलं राज्यं , राज्यस्य मूलं इन्द्रिय जयः
इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवः
वृद्धोपसेवाय विग्न्यानं , विग्न्यानेनं आत्मानं सम्पद्येत
समपदितात्म जितात्मम भवति, जितात्मा सर्वार्थे संयुज्यते
सुख का मूल धर्म है. धर्म का मूल अर्थ है. अर्थ का मूल राज्य है. राज्य का मूल इंद्रिय विजय है. आचार्य लिखवा ही रहे थे की चंद्रगुप्त ने कक्ष में प्रवेश किया.
आचार्य को प्रणाम कर उपस्थित होने का मंतव्य पूछा.
चंद्रगुप्त को देख चाणक्य के माथे पर बल पड़ गये. कड़कती आवाज में पूछा की मगध विजय को जाते समय सेना द्वारा नंदीग्राम प्रवास में ग्रामवासियों से लिए अन्न का मूल्य क्यों नहीं चुकाया गया.
चंद्रगुप्त को जवाब देते नहीं बना. शारंगरव के सामने उन्होंने स्वयं को अपमानित महसूस किया.
चाणक्य ने कठोर स्वर में चंद्रगुप्त से दूसरा प्रश्न किया.
क्या समझ कर तुमने वो अन्न ग्रहण किया. दान या दक्षिणा.
चन्द्रगुप्त के मुंह से बोल ना फूटा.
आचार्य की कड़कती आवाज पुन: गूंजी शारंगरव सम्राट को दान और दक्षिणा का अर्थ समझाओ.
शारंगरव ने बताया. सम्राट दान वह मूल्य है जो सामाजिक कर्तव्य के रूप में दिया जाता है और दक्षिणा वह मूल्य जो किसी सेवा के बदले दिया जाता है.
आचार्य ने चंद्रगुप्त से पूछा तुमने क्या लिया. दान या दक्षिणा.
चंद्रगुप्त ने लज्जित हो कहा कि वे अन्न का मूल्य चुका देंगे.
आचार्य बोले ध्यान रहे चंद्रगुप्त हर वस्तु का मूल्य है. हर सेवा का मूल्य है. और जिसका भी मूल्य है वो अर्थ है. धर्म और काम अर्थ पर ही निर्भर है. इसलिये अर्थ व्यवहार धर्मपूर्वक हो.
बिना मूल्य दिये दूसरे का द्रव्य लेना उसके द्रव्य का अपहरण है. और दूसरे के द्रव्य का अपहरण अपने द्रव्य का नाश है.
चाणक्य की सीख जारी रही. सम्राट अन्न और प्रजा ही तुम्हारा अर्थ है. अन्न का प्रजा से संबंध है. बात समझ में आई.
चंद्रगुप्त ने मरे स्वर में हां बोला.
जा सकते हो. चाणक्य का स्वर भावहीन था.
चंद्रगुप्त मन भर के डग रखता कक्ष से विदा हुआ. 
ह्रदय में ग्लानि भाव था…

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