अंतरजाल
मेरी कविताएं, कहानियां, संवाद और लेख...
बुधवार, 8 जून 2016
अतृप्ति
सृजन
कामना के
वशीभूत है
प्रत्येक निर्माण
लालसा से
अभिभूत है
तृष्णा में
पड़ कर
उसने ये
क्या किया
एक से अनेक
होके
क्या पा लिया
पाप और पुण्य की
रेल पेल में
धरा पर चल रहे
अजब खेल में
वो लिप्त क्यों है
परमात्मा
अतृप्त क्यों है...
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