मुक्त पखेरू अच्छा लगता है
नील गगन उड़ता फिरता है
वन उपवन दाना चुगता है
ना कोई बंधन ना कोई नियम
इसका जीवन सच्चा लगता है
बादल संग पवन का फिरना
बारिश की बूंदों का झरना
बिन नक़्शे बिन मंजिल यूं ही
एकाकी डग भरते चलना
आनंदित करता है
जो सीखा है उसे भुलाना
कुदरत से गुपचुप बतियाना
फाड़ फाड़ कर पोथी पतरे
अंतर अग्नि को सुलगाना
उल्लासित करता है
मुक्त पखेरू अच्छा लगता है...
नील गगन उड़ता फिरता है
वन उपवन दाना चुगता है
ना कोई बंधन ना कोई नियम
इसका जीवन सच्चा लगता है
बादल संग पवन का फिरना
बारिश की बूंदों का झरना
बिन नक़्शे बिन मंजिल यूं ही
एकाकी डग भरते चलना
आनंदित करता है
जो सीखा है उसे भुलाना
कुदरत से गुपचुप बतियाना
फाड़ फाड़ कर पोथी पतरे
अंतर अग्नि को सुलगाना
उल्लासित करता है
मुक्त पखेरू अच्छा लगता है...

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