शनिवार, 11 जून 2016

उड़ान

मुक्त पखेरू अच्छा लगता है
नील गगन उड़ता फिरता है
वन उपवन दाना चुगता है
ना कोई बंधन ना कोई नियम
इसका जीवन सच्चा लगता है

बादल संग पवन का फिरना
बारिश की बूंदों का झरना
बिन नक़्शे बिन मंजिल यूं ही
एकाकी डग भरते चलना
आनंदित करता है

जो सीखा है उसे भुलाना
कुदरत से गुपचुप बतियाना
फाड़ फाड़ कर पोथी पतरे
अंतर अग्नि को सुलगाना
उल्लासित करता है

मुक्त पखेरू अच्छा लगता है...



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