अजन्मा होने पर भी वो माया स्वरुप जन्मता प्रतीत होता है.
जब जब धर्म का क्षय और अधर्म का आधिपत्य बढ़ता है तब तब वो परम छलिया अवतार लेता है.
समय समय पर वह भिन्न भिन्न अवतार लेता है.
जैसे की -
नित्य अवतार - इस अवतार रूप में छलिया ज्ञानियों, सत्पुरुषों और महात्माओं के रूप में जनमानस में सदा उपस्थित रहता है.
नित्य अवतार - इस अवतार रूप में छलिया ज्ञानियों, सत्पुरुषों और महात्माओं के रूप में जनमानस में सदा उपस्थित रहता है.
अंशावतार - यहां छलिया अपनी शक्ति के आंशिक रूप में प्रकट होता है. इस अवतार उद्देश्य में वह किसी एक महत कार्य को पूरा करता है.
आवेशावतार - इस अवतार का प्रादुर्भाव भक्त को संकट से उबारने में होता है. भक्त की प्रार्थना, विश्वास और क्रंदन इस अवतार का सृजन करते हैं.
पूर्णावतार - इसमें छलिया अपने पूर्ण वैभव के साथ प्रकट होता है. यह अवतरण दुष्टों के विनाश साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना का परिचायक है.
छलिया कभी भी कहीं भी किसी भी रूप में अवतार ले सकता है. क्योंकि समस्त ब्रह्मांड उसी में व्याप्त है…

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