शुक्रवार, 10 जून 2016

प्राचीन भारत के ठग


ठग संस्कृत शब्द स्थग का अपभ्रंश है. इसका अर्थ है चोर या बदमाश.
भारत सैंकड़ों सालों से इन ठगों से आक्रान्त था. लम्बी यात्रायें अत्यंत जोखिमपूर्ण थीं. गंतव्य तक ना पहुंचने वाले यात्रियों का प्रतिशत अत्यधिक था.

ये ठग पांच या छह के समूह में मार्गों पर यात्री बन घूमते रहते थे.
ये स्वयं को मुस्लिम कहते थे पर मां काली को पूजते थे. इनके रीति रिवाज हिन्दू मुस्लिम मत का इतना घालमेल लिए हुए थे की कभी स्पष्ट ही नहीं हुआ की इनका वास्तविक धर्म क्या था.

शिकार मिल जाने पर ये स्वयं को मूढ़ और जाहिल जाहिर करते और उससे किसी धार्मिक क्रिया कलाप संबंधी सहयोग मांगते. शिकार इनकी बातों में आ जाता. तब इनमे से कोई 'तमाखू लाओ' का उद्घोष करता. जिसका कूट अर्थ था शिकार का ध्यान बटाना.
जैसे ही शिकार का ध्यान बंटता एक रुमाल से उसका गला घोंट देता.

शिकार के मृत शरीर को गड्ढा खोद जमीन में दबा उसके ऊपर ये उत्सव मनाते थे.

जमीन खोदने कि गैंती और शक्कर इनके पवित्र उपकरण थे. गैंती शव को दफ़नाने के लिए और शक्कर उस स्थान पर चींटियों को आमंत्रित करने के लिये ताकि शव को चींटियां ठिकाने लगा दें.

लार्ड विलियम बैंटिक के अथक प्रयासों द्वारा इन पर काबू पाया गया. हजारों को पकड़ा गया. सैंकड़ों फांसियां हुई. बचे खुचों को नितम्बो पर मोहर लगा सरकारी गवाह बनाया गया.
इस प्रकार इनका उन्मूलन हुआ...


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