मंदिर के सभा भवन में मास्टर सतप्रकाश सिर झुकाये आंखें मूंदे सत्संग सुन रहे थे.
आजकल उनका अधिकांश समय मंदिर में ही गुजर जाता था.
मास्टर जी कुछ दिनों पूर्व प्राइवेट स्कूल में अपनी अध्यापक की नौकरी खो बैठे थे.
यह नौकरी उनकी आजीविका का एक मात्र सहारा थी जिसे वह पिछले बाईस सालों से करते आ रहे थे.
आजकल उनका अधिकांश समय मंदिर में ही गुजर जाता था.
मास्टर जी कुछ दिनों पूर्व प्राइवेट स्कूल में अपनी अध्यापक की नौकरी खो बैठे थे.
यह नौकरी उनकी आजीविका का एक मात्र सहारा थी जिसे वह पिछले बाईस सालों से करते आ रहे थे.
नौकरी जाने का कारण स्कूल का नये स्वामित्व में जाना रहा. नये प्रबंधन द्वारा किसी अज्ञात कारण से अधिकांश पुराना स्टाफ हटा दिया गया.
मास्टर जी के परिवार में केवल उनकी पत्नी और एक बेटी थी. बेटी का विवाह वह दो वर्ष पूर्व कर चुके थे.
मास्टर जी को आजीविका की चिंता दिनरात खाये जा रही थी.
अड़तालीस साल की उम्र में नई नौकरी मिलना पहाड़ चढ़ने जैसा हो गया.
अड़तालीस साल की उम्र में नई नौकरी मिलना पहाड़ चढ़ने जैसा हो गया.
मानसिक शांति के लिये वह इस मंदिर में आ जाते और मंदिर की सेवा का छोटा मोटा कार्य करते रहते.
कभी कभार मंदिर के मैनेजर उपाध्याय जी से भी गपशप हो जाती.
कभी कभार मंदिर के मैनेजर उपाध्याय जी से भी गपशप हो जाती.
मंदिर में अक्सर साधू सन्यासी आते रहते थे.
एक दो दिन ठहरते और आगे चल देते. कभी कोई सभा भवन में श्रद्धालुओं को कथा प्रवचन आदि भी सुना देते.
एक दो दिन ठहरते और आगे चल देते. कभी कोई सभा भवन में श्रद्धालुओं को कथा प्रवचन आदि भी सुना देते.
ऐसे ही एक स्वामी जी आज प्रवचन कर रहे थे जिसे भक्त लोग बड़ी तन्मयता से सुन रहे थे.
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥
स्वामी जी बता रहे थे यदि ईश्वर की कृपा हो तो अक्षम भी वो कार्य कर जाता है जो सक्षम को भी कठिन पड़ें.
हुंह ! मास्टरजी के मन में विचार आया. सब कहने सुनने की बातें हैं. जिस पर बीतती है वही जानता है.
इन साधू सन्यांसियों का क्या है कुछ भी बोल देते हैं. इनपर घर परिवार की जिम्मेदारी होती तो सब आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता.
इन साधू सन्यांसियों का क्या है कुछ भी बोल देते हैं. इनपर घर परिवार की जिम्मेदारी होती तो सब आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता.
उनका मन सत्संग से उचट गया और वे सभा भवन से बाहर आ गये.
तभी उपाध्याय जी की आवाज कानों में पड़ी मास्टरजी जरा एक मिनट आईये तो.
मास्टरजी ने उपाध्याय जी को कुछ चिंतित पाया. उपाध्याय जी कहने लगे आप तो जानते हो मंदिर में लगभग रोज ही भंडारे होते हैं.
तभी उपाध्याय जी की आवाज कानों में पड़ी मास्टरजी जरा एक मिनट आईये तो.
मास्टरजी ने उपाध्याय जी को कुछ चिंतित पाया. उपाध्याय जी कहने लगे आप तो जानते हो मंदिर में लगभग रोज ही भंडारे होते हैं.
कल दोपहर का भंडारा है लेकिन बनायेगा कौन यह अभी तक निश्चित नहीं.
बंसी यह काम करता था लेकिन कुछ दिनों से बदमाश के तेवर ही बिगड़े हुए थे. कल दुष्ट हमेशा के लिये काम छोड़ गया.
मास्टरजी को ध्यान आया तीन चार दिन पहले उन्होंने बंसी को उपाध्याय जी से तीखी बहस करते देखा था.
बंसी यह काम करता था लेकिन कुछ दिनों से बदमाश के तेवर ही बिगड़े हुए थे. कल दुष्ट हमेशा के लिये काम छोड़ गया.
मास्टरजी को ध्यान आया तीन चार दिन पहले उन्होंने बंसी को उपाध्याय जी से तीखी बहस करते देखा था.
आजकल शादियों का सीजन है कोई हलवाई और कैटरर खाली नहीं है.
फिर मंदिर के काम में पैसा कम मिलता है तो कोई जल्दी इधर आता भी नहीं.
फिर मंदिर के काम में पैसा कम मिलता है तो कोई जल्दी इधर आता भी नहीं.
क्या आपकी निगाह में कोई है जो यह काम कर सके. भंडारा कैंसिल नहीं किया जा सकता भक्त एक महीने पहले ही रकम जमा कर बुकिंग करा गया है.
मास्टरजी किसी हलवाई वगैरह को नहीं जानते थे सो इंकार में सिर हिला दिया. उपाध्याय जी ने निराश भाव से ठंडी सांस भरी. मास्टरजी ने पूछा भंडारे में क्या बनना है.
बघारी हुई चना दाल और चावल.
बघारी हुई चना दाल और चावल.
मास्टरजी हैरानी से बोले यह तो कोई भी बना देगा.
इतना आसान नहीं है. पंद्रह सौ लोगों का भंडारा है कोई चूक हो गई तो लफड़ा हो जायेगा.
और फिर हर किसी को मंदिर के भोजन की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती.
और फिर हर किसी को मंदिर के भोजन की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती.
मास्टरजी के दिमाग में द्वंद चलने लगा. खाना बनाना उन्हें आता था पर चार छह लोगों से ज्यादा का खाना उन्होंने कभी नहीं बनाया था.
बोले दाल चावल तो मैं बना लेता हूं पर किसी मौके का खाना कभी नहीं बनाया. अगर एक दो लोगों का साथ मिल जाये तो शायद बात बन जाये.
बोले दाल चावल तो मैं बना लेता हूं पर किसी मौके का खाना कभी नहीं बनाया. अगर एक दो लोगों का साथ मिल जाये तो शायद बात बन जाये.
उपाध्याय जी के चेहरे पर रौनक दौड़ गई. पता नहीं क्यों उन्हें मास्टरजी पर विश्वास सा हुआ.
बोले मैं मंदिर से दो सेवादार दे दूंगा. वो मदद कर देंगे. बर्तन आदि मंदिर की रसोई में हैं ही. आप मुझे मात्रा लिखा दें. मैं सामान स्टोर से रसोई घर में रखवा दूंगा.
मास्टरजी ने चार आदमियों की मात्रा को पंद्रह सौ आदमियों के हिसाब से गुणित किया और एक कागज़ पर उपाध्याय जी को दाल चावल मसाले घी और सब्जियों की मात्रा लिख कर दे दी.
बोले मैं मंदिर से दो सेवादार दे दूंगा. वो मदद कर देंगे. बर्तन आदि मंदिर की रसोई में हैं ही. आप मुझे मात्रा लिखा दें. मैं सामान स्टोर से रसोई घर में रखवा दूंगा.
मास्टरजी ने चार आदमियों की मात्रा को पंद्रह सौ आदमियों के हिसाब से गुणित किया और एक कागज़ पर उपाध्याय जी को दाल चावल मसाले घी और सब्जियों की मात्रा लिख कर दे दी.
सुबह आठ बजे आने का वादा कर मास्टरजी बोझिल क़दमों से घर की ओर चल दिये. अब यह एक नई चिंता सिर पर सवार हो गई.
घर पहुंच कर पत्नी को सारी बात बताई तो वह भी घबरा गई. हे भगवान बैठे बिठाये यह क्या बला मोल ले ली. कुछ उन्नीस बीस हो गया तो भद्द पिट जायेगी. मास्टरजी को रात भर नींद नहीं आई.
घर पहुंच कर पत्नी को सारी बात बताई तो वह भी घबरा गई. हे भगवान बैठे बिठाये यह क्या बला मोल ले ली. कुछ उन्नीस बीस हो गया तो भद्द पिट जायेगी. मास्टरजी को रात भर नींद नहीं आई.
अगले दिन सुबह नहा धोकर मास्टरजी ठीक आठ बजे मंदिर पहुंच गये.
भगवान को प्रणाम कर उपाध्याय जी के पास पहुंचे. मास्टरजी को देख उपाध्याय जी की जान में जान आई. फ़ौरन दो सेवादारों को आवाज देकर बुलाया और उनके सुपुर्द कर दिया.
भगवान को प्रणाम कर उपाध्याय जी के पास पहुंचे. मास्टरजी को देख उपाध्याय जी की जान में जान आई. फ़ौरन दो सेवादारों को आवाज देकर बुलाया और उनके सुपुर्द कर दिया.
मास्टरजी का दिल उछल कर हलक से टकराने लगा. रसोईघर में पहुंच कर चारों तरफ यूं देखने लगे जैसे कोई योद्धा रणभूमि का जायजा ले रहा हो.
श्रीगणेश को याद कर तुरंत दो बड़े पतीलों में दाल और चावल भिगोने रख सेवादारों के साथ टमाटर हरीमिर्च और धनिया काटना शुरू कर दिया. सब्जियों की कटाई घंटा भर चली.
जल्दी ही चूल्हों पर दाल चावल पकने लगे. बीच में कई बार उपाध्याय जी भी रसोईघर में झांक गये थे. आज उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थी.
जल्दी ही चूल्हों पर दाल चावल पकने लगे. बीच में कई बार उपाध्याय जी भी रसोईघर में झांक गये थे. आज उनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी थी.
नियत समय पर भक्त सपरिवार भंडारा वितरित करने आ पहुंचा. भगवान को भोग लगा भंडारा वितरित होने लगा.
मास्टर जी दम साधे खाने वालों का चेहरा पढ़ने लगे. घबराये से कभी इसे देखते कभी उसे. लेकिन यह क्या लोग गपागप दाल चावल खा रहे थे.
किसी के चेहरे पर कोई शिकायती भाव ना था. मास्टरजी ने चैन की एक मील लम्बी सांस ली.
मास्टर जी दम साधे खाने वालों का चेहरा पढ़ने लगे. घबराये से कभी इसे देखते कभी उसे. लेकिन यह क्या लोग गपागप दाल चावल खा रहे थे.
किसी के चेहरे पर कोई शिकायती भाव ना था. मास्टरजी ने चैन की एक मील लम्बी सांस ली.
तभी सेवादार ने आकर कहा की उपाध्याय जी आपको बुला रहे हैं.
उपाध्याय जी गदगद थे तुरंत मास्टरजी को गले लगा लिया. दोनों ने केबिन में ही प्रसाद मंगवा कर चखा. प्रसाद बहुत बढ़िया बना था.
उपाध्याय जी गदगद थे तुरंत मास्टरजी को गले लगा लिया. दोनों ने केबिन में ही प्रसाद मंगवा कर चखा. प्रसाद बहुत बढ़िया बना था.
उपाध्याय जी ने पांच पांच सौ के दो नोट मास्टरजी के सामने रख हाथ जोड़ दिये. मास्टरजी हकबका गये.
उन्हें तो यह गुमान ही ना था की इस सेवा के बदले मेहनताना मिलेगा.
उपाध्याय जी कहने लगे इस महीने चौदह भंडारे और हैं अब सभी आपको निपटाने हैं.
उन्हें तो यह गुमान ही ना था की इस सेवा के बदले मेहनताना मिलेगा.
उपाध्याय जी कहने लगे इस महीने चौदह भंडारे और हैं अब सभी आपको निपटाने हैं.
कल खिचड़ी का भंडारा है उसकी व्यवस्था बनाइये.
इसके अलावा कुछ कढ़ी चावल और कुछ सब्जी पूरी हलवे के भी भंडारे हैं. मुझे पूरा विश्वास है आप यह काम संभाल लेंगे.
सब्जी पूरी हलवे का मेहनताना साढ़े तीन हजार है. एक दो हेल्परों का जुगाड़ कीजिये बाकी मेरा पूरा सहयोग रहेगा.
इसके अलावा कुछ कढ़ी चावल और कुछ सब्जी पूरी हलवे के भी भंडारे हैं. मुझे पूरा विश्वास है आप यह काम संभाल लेंगे.
सब्जी पूरी हलवे का मेहनताना साढ़े तीन हजार है. एक दो हेल्परों का जुगाड़ कीजिये बाकी मेरा पूरा सहयोग रहेगा.
मास्टरजी को लगा जैसे उनका नया जन्म हो गया हो.
उन्हें अपने भीतर अपार उत्साह का अनुभव हुआ. वे नोट जेब में रख उपाध्याय जी को आश्वास्त कर घर की ओर लपके. यह समाचार तुरंत पत्नी को सुना देना चाहते थे.
आज घर की ओर जाते हुए उनके क़दमों में दृढ़ता थी.
उन्हें अपने भीतर अपार उत्साह का अनुभव हुआ. वे नोट जेब में रख उपाध्याय जी को आश्वास्त कर घर की ओर लपके. यह समाचार तुरंत पत्नी को सुना देना चाहते थे.
आज घर की ओर जाते हुए उनके क़दमों में दृढ़ता थी.
ऊपर गगन मंडल में भगवान सूर्य नारायण मानो मंद मंद मुस्कुरा रहे थे…
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