बुधवार, 8 जून 2016

हजरत निजामुद्दीन

दिल्ली में एक किला है नाम है तुगलकाबाद किला. इसका निर्माण सुलतान गयासुद्दीन तुगलक ने करवाया था. जब किले का निर्माण हो रहा था तो अक्सर ही मजदूर कम पड़ जाते और निर्माण कार्य धीमा चलता. जबकि सुलतान चाहता था की किले का काम जल्द से जल्द पूरा हो जाए.
जब बहुत दिनों तक यही सिलसिला रहा तो सुलतान क्रोधित हो गया और मुख्य निर्माणकर्ता को तलब करवाया. जब उससे जवाब तलबी की गयी तो उसने बताया की पास ही एक फ़क़ीर बावली बनवा रहे हैं और सारे मजदूर वहीँ काम करने चले जाते हैं और यहाँ आना नहीं चाहते. फ़क़ीर का नाम पूछा तो निर्माणकर्ता ने बताया की फ़क़ीर का नाम हजरत निजामुद्दीन है.

सुलतान को यह बात बहुत नागवार गुजरी की मजदूर सुलतान का काम छोड़ कर एक साधारण फ़क़ीर को तवज्जो दें रहे हैं. उसने तुरंत आदेश दे कर बावली का काम रुकवा दिया. लेकिन कुछ दिन बाद सुलतान को पता चला की बावली का निर्माण कार्य चालू था. दिन में मजदूर सुलतान के किले में काम करते और रात में दीये की रौशनी में बावली का निर्माण करते. सुलतान ने फ़क़ीर को तेल बेचने या देने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन इसका भी बावली के निर्माण कार्य पर कोई असर नहीं हुआ. सुलतान को समाचार मिला की फ़क़ीर जब बावली का पानी दीयों में डालते तो वो तेल में बदल जाता और दीये जलने लगते.

अब तो सुलतान गुस्से से पागल ही हो गया उसने फ़ौरन आदेश जारी किया की बावली से पानी नहीं निकाला जाएगा.
जब इस नए आदेश की खबर फ़क़ीर तक पहुंची तो उन्होंने किले को शाप दे दिया " या रहे ऊसर , या बसें गूजर ". सुलतान को जब फ़क़ीर के शाप से अवगत कराया गया तो उस समय उसे फ़ौरन बंगाल कूच करना था. जाते जाते वो बोला की बंगाल से लौट कर फ़क़ीर को सबक सिखाऊंगा.

जब फ़क़ीर को सुलतान के मंसूबे के बारे में बताया गया तो वो बोले की अब सुलतान कभी दिल्ली नहीं लौटेगा. इतिहास गवाह है की फिर सुलतान कभी दिल्ली नहीं लौटा. बंगाल विजय के बाद जब सुलतान दिल्ली लौट रहा था तो दिल्ली की सीमा के बाहर उसके स्वागत के लिए एक भव्य स्वागत द्वार बनवाया गया. हाथी पर सवार सुलतान जैसे ही इस स्वागत द्वार के नीचे से गुजरा तो ये भारी द्वार उसके ऊपर आ पड़ा और सुलतान की तुरंत मौत हो गयी.

सुलतान की मृत्यु के बाद उसके पुत्र मुहम्मद तुगलक ने भी इस किले को त्याग दिया और आदिलाबाद में नया किला बनवाया. समय के साथ किले में जंगली जानवर विचरने लगे और घुमंतू गूजर जाति के लोगों ने इस उजड़े किले में डेरा डाल दिया.
इस तरह फ़क़ीर हजरत निजाम्मुद्दीन का शाप पूरा हुआ...



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