सुरेश को घर के पास वाले शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में वह अक्सर दिख जाती.
दीन हीन मरियल सी चेहरे पर बेचारगी के भाव लिये वह बूढ़ी घूम घूम कर भीख मांग रही होती.
उसे देख सुरेश द्रवित हो जाता. बूढी को कुछ देने के लिये उसका हाथ स्वयमेव जेब में चला जाता.
दीन हीन मरियल सी चेहरे पर बेचारगी के भाव लिये वह बूढ़ी घूम घूम कर भीख मांग रही होती.
उसे देख सुरेश द्रवित हो जाता. बूढी को कुछ देने के लिये उसका हाथ स्वयमेव जेब में चला जाता.
हालांकि वह खुद आजकल बेरोजगार चल रहा था और बुरी तरह आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. पिछली नौकरी कम्पनी में हुई व्यापक छंटनी की भेंट चढ़ गई थी और आज चार महीने बाद भी वो खाली था. शहर में नौकरियों का मानो अकाल सा पड़ा था.
वह बूढी भिखारन उसके दिमाग में हलचल मचा देती और उसे ईश्वर पर क्रोध आ जाता. उफ्फ कैसी दुनिया बनाई है ऊपर वाले ने.
बूढ़े अशक्त और लाचार लोग पेट की खातिर भीख मांगते घूम रहे हैं. बाजारों में तिरस्कृत हो रहे हैं. कैसा वीभत्स संसार है.
बूढ़े अशक्त और लाचार लोग पेट की खातिर भीख मांगते घूम रहे हैं. बाजारों में तिरस्कृत हो रहे हैं. कैसा वीभत्स संसार है.
लेकिन उसे संतोष भी होता की दुनिया में भले लोग भी हैं.
जब उसे पता चला था की वैष्णव ढाबे वाला बूढी को काफी समय से मुफ्त खाना खिलाता आ रहा है तो उसे बहुत खुशी हुई थी.
ढाबे वाले ने बूढी से कह रखा था की वो जब भी इस तरफ आये दो रोटी उसके ढाबे पर खा लिया करे वह पैसे नहीं लेगा.
जब उसे पता चला था की वैष्णव ढाबे वाला बूढी को काफी समय से मुफ्त खाना खिलाता आ रहा है तो उसे बहुत खुशी हुई थी.
ढाबे वाले ने बूढी से कह रखा था की वो जब भी इस तरफ आये दो रोटी उसके ढाबे पर खा लिया करे वह पैसे नहीं लेगा.
ऐसे ही एक बार राजू पनवाड़ी को उसने शाम को बूढी को आधा लीटर दूध की थैली देते देखा था.
पूछने पर राजू ने बताया था की बूढी पर तरस खाकर वह उसे पिछले कई महीनों से दूध देता आ रहा है. यही नहीं उसके बगल का सब्जी वाला भी जब तब बूढी को सब्जी फल आदि दे दिया करता है.
आह ! इन्हीं जैसे विशाल हृदयों की वजह से धरती टिकी है. वरना कभी की रसातल में डूब जाती.
पूछने पर राजू ने बताया था की बूढी पर तरस खाकर वह उसे पिछले कई महीनों से दूध देता आ रहा है. यही नहीं उसके बगल का सब्जी वाला भी जब तब बूढी को सब्जी फल आदि दे दिया करता है.
आह ! इन्हीं जैसे विशाल हृदयों की वजह से धरती टिकी है. वरना कभी की रसातल में डूब जाती.
सुरेश को कुछ फोटोकॉपीज करानी थी. वह पेपर्स इकट्ठे कर ही रहा था की मकान मालिक गुप्ता जी की आवाज कानों में पड़ी. कैसे हो सुरेश बाबू.
गुप्ता जी भले आदमी थे. दूसरों का दुखदर्द समझने वाले. दो महीने से सुरेश ने किराया नहीं दिया था पर गुप्ता जी ने उसे कभी टोका नहीं. वह उसकी मजबूरी समझ रहे थे.
गुप्ता जी भले आदमी थे. दूसरों का दुखदर्द समझने वाले. दो महीने से सुरेश ने किराया नहीं दिया था पर गुप्ता जी ने उसे कभी टोका नहीं. वह उसकी मजबूरी समझ रहे थे.
मेरा एक काम करोगे. सुप्रीम इलेक्ट्रिकल वाले से बिजली का कुछ सामान लाना है. अगर उस तरफ जाना हो तो कष्ट कर लेना. अरे कष्ट कैसा सर जरूर और उसने गुप्ता जी से पर्ची और पैसे ले लिये.
सुरेश जब सुप्रीम इलेक्ट्रिकल्स पहुंचा तो चकित रह गया.
वहां बूढी बैठी सिक्कों की मीनारें बना रही थी. एक दो पांच और दस के सिक्कों की मीनारे.
साथ ही ढेर सारे पांच दस बीस और पचास के नोटों की तहें.
वहां बूढी बैठी सिक्कों की मीनारें बना रही थी. एक दो पांच और दस के सिक्कों की मीनारे.
साथ ही ढेर सारे पांच दस बीस और पचास के नोटों की तहें.
दुकानदार ने फटाफट सिक्के और नोट गिने और उनकी एवज में एक पांच सौ का और तीन सौ सौ के नोट बूढी के हवाले कर दिये. बूढी नोट लेकर फ़ौरन ही वहां से निकल गई.
सुरेश से रहा नहीं गया उसने दुकानदार से बूढी के बारे पूछा.
दुकानदार ने बताया बूढी अच्छे घर से है. दो बेटे हैं और तारकोल बिछाने का काम करते हैं. अपना घर है. घर में ट्रैक्टर आदि भी है.
पर ये बुढ़िया बहुत स्वाभिमानी है. घर टिकती ही नहीं. कहती है बैठ कर नहीं खा सकती. लड़के इसके आगे मजबूर हैं.
दुकानदार ने बताया बूढी अच्छे घर से है. दो बेटे हैं और तारकोल बिछाने का काम करते हैं. अपना घर है. घर में ट्रैक्टर आदि भी है.
पर ये बुढ़िया बहुत स्वाभिमानी है. घर टिकती ही नहीं. कहती है बैठ कर नहीं खा सकती. लड़के इसके आगे मजबूर हैं.
हमारी दुकान का फुटफॉल अच्छा है. सिक्कों और छोटे नोटों की हमेशा कमी रहती है.
इस बुढ़िया का बड़ा सहारा है. रोज सात आठ सौ का छुट्टा दे जाती है.
अगर कोई तीज त्यौहार हो तो इसका कलेक्शन हजार बारह सौ तक चला जाता है.
हम पर इसका बड़ा विश्वास है. हमारे अलावा और किसी को छुट्टा नहीं देती.
इस बुढ़िया का बड़ा सहारा है. रोज सात आठ सौ का छुट्टा दे जाती है.
अगर कोई तीज त्यौहार हो तो इसका कलेक्शन हजार बारह सौ तक चला जाता है.
हम पर इसका बड़ा विश्वास है. हमारे अलावा और किसी को छुट्टा नहीं देती.
यह सुनते हुए सुरेश को लगा जैसे कान बहरे हो गये हों.
हवा को अचानक किसी ने फाड़ दिया था.
स्वाभिमान निर्लज्जता बेहयाई आपस में टकराते हुए दिमाग में धमाके करने लगे थे…
हवा को अचानक किसी ने फाड़ दिया था.
स्वाभिमान निर्लज्जता बेहयाई आपस में टकराते हुए दिमाग में धमाके करने लगे थे…
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