अंतरजाल
मेरी कविताएं, कहानियां, संवाद और लेख...
शुक्रवार, 10 जून 2016
अनुभव
पिता का
हाथ
बंटाते बंटाते
उसे जूते
मरम्मत करना
भा गया है
उनके जरिये
आदमी को
पढ़ना
आ गया है
वो जान
गया है की
फटे उधड़े
घिसे और
बदरंग जूते
जीते जी
मरते हैं
जो दर्द
जुबान
नहीं
कह पाती
उसे जूते
कहते हैं...
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