शुक्रवार, 10 जून 2016

सूर्य ग्रहण

आज सूर्य ग्रहण है.
लेकिन पंडित मुरली माधव जी ने कल से ही तैयारी शुरू कर दी थी.
पूजा का बक्सा, लकड़ी का तख़्त, खजूर की चटाईयां और आसन, बांस, लकड़ी के पीढ़े सब सहेज लिया था. 
सुबह सवेरे ही ढुलाई रिक्शा में सामान लाद अपने सात बरस के एकमात्र पुत्र कान्हा के संग गंगा किनारे आ डटे थे.
यहां घाट सजेगा. पंडित मुरली माधव जी और कान्हा का घाट.
पंडित जी का रंग सांवला और खिचड़ी दाढ़ी थी. उम्र कोई पैंतालीस के लगभग. केवल शिखा, जनेऊ और चंदन तिलक से ही उनके पंडित होने की पुष्टि होती थी अन्यथा वे पंडित नहीं लगते थे.
ग्रहण ग्यारह बजे शुरू होगा. पूर्ण ग्रहण है सो लंबा चलेगा. अमावस्या है भगतों की भारी भीड़ होगी. जप तप ध्यान पूजा उपाय सब होगा. आज फुरसत नहीं मिलेगी.
पंडित जी काम में जुटे हैं. बांस गाड़ उनके मध्य खजूर की चटाईयां बांध घाट का परिसर बनाया. परिसर में प्रवेश के एक तरफ तख़्त डाल उसपर दरी बिछा पूजा का बक्सा जमा दिया.
पंडित जी का आसन तैयार था. शेष परिसर में बची चटाईयां आसन और पीढ़े रख दिये.
इस बीच कान्हा धीरे धीरे गंगा किनारे उमड़ते लोगों के हुजूम को देखता इधर उधर कूद रहा था.
सब तैयारी कर पंडित जी गंगा स्नान को चले.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करते तीन डुबकियां मारी और कृष्ण कृष्ण कहते जल से बाहर आ गये. नवंबर का महीना था ठंडी आरम्भ हो गयी थी.
जल बरफ सा शीतल था.
जल्दी से वस्त्र बदले और पूजा के बक्से में से लड्डू गोपाल की प्रतिमा निकाल उन्हें भी तीन डुबकियों का स्नान करा दिया.
जनसमूह बढ़ता ही जा रहा था. कई तो पंडित जी के घाट पर झांक भी गये थे.
पंडित जी ने अब स्नान के लिये कान्हा को आवाज दी.
कान्हा ना नुकुर करने लगा तो पंडित जी ने मीठी झिड़की दी.
जब हमारे लड्डू गोपाल सुबह सवेरे स्नान कर सकते हैं तो तुम क्यों नहीं.
जल्दी से डुबकी मारो और पूर्वाभिमुख बैठ कर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जपो. जल्दी करो
भगत लोग आते ही होंगे.
शन: शन: परिसर में काफी लोग जमा हो गये.
स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े तमाम लोग. पंडित जी किसी को यौगिक क्रिया बतलाते तो किसी की पूजा करते कोई उपाय पूछता था तो कोई राहु से त्रस्त था.
पंडित जी सबका कल्याण कर रहे थे साथ ही साथ ग्रहणकाल में गंगा स्नान की महत्ता भी समझाते जाते.
कान्हा अपने समवय बच्चों संग खेल में मगन था.
पंडित जी को नकद दक्षिणा के संग फल मिठाई और वस्त्रों की खूब प्राप्ति हो रही थी.
खाद्य सामग्री पर पंडित जी कुशा और तुलसी दल रखते जाते यूं सामग्री को ग्रहण दोष नहीं लगता.
चारों तरफ अद्भुत दृश्य था. कोई कमर तक जल में खड़ा हो नारियल बहाता था तो कोई एकाग्रचित्त हो मन्त्र जपता था. कोई केवल स्नान करके ही प्रसन्न था. सब अपनी धुन में लगे थे. सबके नवग्रह शांत हो रहे थे.
पंड़ित जी आज ख़ुशी से फूले ना समाते थे. मुख से बारम्बार कृष्ण कृष्ण भज रहे थे.
सांझ होते होते मेला छटा. भगत लोग घर को चले.
पंडित जी का ढुलाई रिक्शा भी आ पहुंचा. चटपट घाट उखाड़ रिक्शे पर लाद दिया गया.
आगे आगे रिक्शा और उसके पीछे कान्हा की उंगली पकड़े पंडित जी मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को हजार धन्यवाद देते घर की ओर जा रहे थे.
बहुत दिनों बाद आज मुफलिसी से ग्रहण जो हटा था…

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