दोपहर के बारह बज गये थे पर अभी तक एक भी बिल नहीं कटा था.
सोमेश को समझ में नहीं आ रहा था की यह हो क्या रहा है.
कल भी मात्र चालीस हजार की सेल हुई थी. परसों भी कुल दो ही बिल बने थे. सेल दिनोंदिन गिर क्यों रही है.
यही हाल रहा तो कम्पनी अपना खर्चा कैसे निकालेगी.
सोमेश को समझ में नहीं आ रहा था की यह हो क्या रहा है.
कल भी मात्र चालीस हजार की सेल हुई थी. परसों भी कुल दो ही बिल बने थे. सेल दिनोंदिन गिर क्यों रही है.
यही हाल रहा तो कम्पनी अपना खर्चा कैसे निकालेगी.
सोमेश ड्राई फ्रूट्स , हर्ब्स और मसालों का इंस्टीट्यूशनल सप्लायर था.
तमाम बड़े होटल्स और फ़ूड कंपनीज उससे माल लेती थीं.
सालों साल कठोर मेहनत कर उसने अपने बिजनेस को खड़ा किया था.
कुछ दिन पहले उसने चाईनीज हर्ब्स की डायरेक्ट परचेज के लिये चाइना टूर भी किया था. इससे उसकी हर्ब्स की परचेज काफी सस्ती हो गई थी.
तमाम बड़े होटल्स और फ़ूड कंपनीज उससे माल लेती थीं.
सालों साल कठोर मेहनत कर उसने अपने बिजनेस को खड़ा किया था.
कुछ दिन पहले उसने चाईनीज हर्ब्स की डायरेक्ट परचेज के लिये चाइना टूर भी किया था. इससे उसकी हर्ब्स की परचेज काफी सस्ती हो गई थी.
रेट्स क्वालिटी पॉलिसी किसी भी चीज में उसने कोई परिवर्तन नहीं किया था.
ना ही बाज़ार में कोई नया सप्लायर ही आया था. फिर ऐसा क्यों हो रहा है.
ना ही बाज़ार में कोई नया सप्लायर ही आया था. फिर ऐसा क्यों हो रहा है.
सोमेश दिमाग पर बार बार जोर डालता और सोचता. आखिर पिछले डेढ़ दो महीनों में ऐसा क्या हो गया है की उसकी दो लाख रूपए रोज की सेल चालीस पचास हजार पर अटक गई है.
रह रह कर उसके दिमाग में एक ही चेहरा कौंधता मिथिलेश दास.
मिथिलेश ने उसे डेढ़ महीना पहले ज्वाइन किया था. मिथिलेश बीएससी एमबीए था पर शकल से गंवार लगता था.
मिथिलेश डिलिवरी सुपरवाईजर था. ऑर्डर्स को बिल करा कर कम्पनी की गाड़ियों में लोड कराना उसका काम था.
मिथिलेश ने उसे डेढ़ महीना पहले ज्वाइन किया था. मिथिलेश बीएससी एमबीए था पर शकल से गंवार लगता था.
मिथिलेश डिलिवरी सुपरवाईजर था. ऑर्डर्स को बिल करा कर कम्पनी की गाड़ियों में लोड कराना उसका काम था.
मिथिलेश उसे अजीब लगता था.
ना कपड़े पहनने का शऊर ना खाने पीने का.
झोलझाल सा पहनावा तेल चुपड़े बाल और चाय भी सुड़क कर पीता था.
हालांकि अपने काम में उसने कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया था.
ना कपड़े पहनने का शऊर ना खाने पीने का.
झोलझाल सा पहनावा तेल चुपड़े बाल और चाय भी सुड़क कर पीता था.
हालांकि अपने काम में उसने कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया था.
सोमेश का शक गहराने लगा.
हो ना हो मिथिलेश ही गड़बड़ है. किसी किसी के पैर अशुभ होते हैं.
जहां पड़ते हैं वहीँ भट्ठा बैठ जाता है.
और फिर मिथिलेश ने उसे बताया भी तो था की उसके माता पिता बचपन में ही गुजर गये थे. चाचा के घर कैसे वह अभावों में पला था. फिर चाचा भी चल बसे.
कितनी मुश्किलों में उसने अपनी पढ़ाई की है.
हो ना हो मिथिलेश ही गड़बड़ है. किसी किसी के पैर अशुभ होते हैं.
जहां पड़ते हैं वहीँ भट्ठा बैठ जाता है.
और फिर मिथिलेश ने उसे बताया भी तो था की उसके माता पिता बचपन में ही गुजर गये थे. चाचा के घर कैसे वह अभावों में पला था. फिर चाचा भी चल बसे.
कितनी मुश्किलों में उसने अपनी पढ़ाई की है.
और तो और जिस दिन उसने ज्वाइन किया था उसी दिन कम्पनी की एक डिलिवरी वैन भी एक्सीडेंट हुई थी.
हां यही है.
जब से इसने ज्वाइन किया है तभी से सेल टूटी है.
इसका कुछ करना पड़ेगा. रिस्क नहीं लिया जा सकता.
भले कामकाज में ठीक है पर मनहूस है. कुछ दिन यहां रुक गया तो बेड़ा गर्क कर देगा.
सोमेश ने एकाउंटेंट को बुलाया और मिथिलेश का टर्मिनेशन लैटर और हिसाब बनाने को कहा.
आज तक की सेलरी और एक महीने का एडवांस.
थोड़ी देर में ही एकाउंटेंट एक लिफ़ाफ़े में टर्मिनेशन लैटर और एक चेक उसकी टेबल पर रख गया.
सोमेश ने एकाउंटेंट को ताकीद की कि वह इसके बारे में किसी को ना बताये वह खुद मिथिलेश से बात करेगा.
जब से इसने ज्वाइन किया है तभी से सेल टूटी है.
इसका कुछ करना पड़ेगा. रिस्क नहीं लिया जा सकता.
भले कामकाज में ठीक है पर मनहूस है. कुछ दिन यहां रुक गया तो बेड़ा गर्क कर देगा.
सोमेश ने एकाउंटेंट को बुलाया और मिथिलेश का टर्मिनेशन लैटर और हिसाब बनाने को कहा.
आज तक की सेलरी और एक महीने का एडवांस.
थोड़ी देर में ही एकाउंटेंट एक लिफ़ाफ़े में टर्मिनेशन लैटर और एक चेक उसकी टेबल पर रख गया.
सोमेश ने एकाउंटेंट को ताकीद की कि वह इसके बारे में किसी को ना बताये वह खुद मिथिलेश से बात करेगा.
सोमेश ने चपरासी को चाय लाने के लिये कहा और आंख बंद कर खुद को रिलेक्स करने की कोशिश करने लगा.
अचानक फोन की घंटी बजी. मौर्या होटल से फोन था.
सोमेश फुर्ती से ऑर्डर नोट करने लगा. आइटम्स के साथ ही उसे मौर्या के परचेज ऑफिसर वर्मा के शब्द कानों में पड़े आज आपको खुश कर देंगे सोमेश बाबू.
बहुत बड़ा ऑर्डर निकला है.
अचानक फोन की घंटी बजी. मौर्या होटल से फोन था.
सोमेश फुर्ती से ऑर्डर नोट करने लगा. आइटम्स के साथ ही उसे मौर्या के परचेज ऑफिसर वर्मा के शब्द कानों में पड़े आज आपको खुश कर देंगे सोमेश बाबू.
बहुत बड़ा ऑर्डर निकला है.
अगले पंद्रह मिनट भी दूसरे ग्राहकों के ऑर्डर नोट करने में ही बीते. अचानक कमाल हो गया था. कुछ ही देर में उसके पास ढेर सारे ऑर्डर थे.
सोमेश डिलिवरी की अगली व्यवस्था के बारे में सोचने लगा. कर लेंगे मैनेज. काम तो आये बन्दों की कमी नहीं है.
तभी फिर फोन बजा.
सोमेश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ रिसीवर कान पर लगाया तो दूसरी तरफ से पत्नी की आवाज आई.
'सुनो जी नाराज ना होना आज बहुत गड़बड़ हो गई. मैं पार्लर गई हुई थी अभी लौटी तो पता चला.
सोमेश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ रिसीवर कान पर लगाया तो दूसरी तरफ से पत्नी की आवाज आई.
'सुनो जी नाराज ना होना आज बहुत गड़बड़ हो गई. मैं पार्लर गई हुई थी अभी लौटी तो पता चला.
वो मरी कामवाली है ना उसने बड़ा नुक्सान कर दिया.
तुम जो दो महीने पहले चाइना से बीस हजार में क्वार्ट्ज का गुडलक वाला लाफिंग बुद्धा लाये थे ना. वो मरी ने सफाई करते वक्त तोड़ दिया.
तुम जो दो महीने पहले चाइना से बीस हजार में क्वार्ट्ज का गुडलक वाला लाफिंग बुद्धा लाये थे ना. वो मरी ने सफाई करते वक्त तोड़ दिया.
आधे घंटे पहले टूटा है. चार टुकड़े हो गये उसके'.
हम्म ! आकर देखता हूं कहकर उसने फोन काट दिया.
हम्म ! आकर देखता हूं कहकर उसने फोन काट दिया.
सोमेश सीट से उठ खड़ा हुआ और ऑफिस में टहलने लगा.
खिड़की से बाहर झांका तो मिथिलेश डिलिवरी वैन के ड्राईवर के साथ किसी बात पर हंसता हुआ दिखाई दिया. कितनी सरल हंसी थी उसकी.
सोमेश ने टेबल पर से टर्मिनेशन लैटर और चेक वाला लिफाफा उठाया और पुर्जा पुर्जा कर डस्टबीन के हवाले कर दिया…
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