शुक्रवार, 10 जून 2016

स्वीकार

मेरी कोई 
छवि नहीं है
क्योंकि
मैं बह रहा हूं
जिन्दगी के कान में
रोज एक नया गीत
कह रहा हूं
रोता हूं हंसता हूं
गाता बहकता हूं
महफ़िल में शमा सा
दिन रात जल रहा हूं
कोई भी सांचा
मेरे नाप का नहीं है
मैंने भी कभी कुछ
मापा नहीं है
सब जमा घटा
व्यर्थ कर रहा हूं
मेरी कोई
छवि नहीं है
क्योंकि
मैं बह रहा हूं...



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