रविवार, 19 जून 2016

पिता

रिश्तों के
अनेक
तल हैं
कुछ पाताल
तो कुछ महातल हैं
पिता जैसा
कोई तल नही
वे
एक साथ
सुतल
वितल
अतल
सब हैं...

शनिवार, 11 जून 2016

शाप और वरदान

जिन्दगी अजीब है यहां वरदान शाप में बदल जाते हैं और शाप वरदान में.
राजा दशरथ तीन विवाह करने के उपरांत भी नि:संतान थे. बूढ़े भी हो चले थे.
एक दिन अचानक शिकार खेलते उनके हाथो श्रवण कुमार मारा गया.
पुत्र शोक से व्याकुल श्रवण कुमार के माता पिता ने राजा दशरथ को शाप दे दिया की तुम भी हमारी तरह पुत्र वियोग में तड़प तड़प कर मरोगे.
यह शाप राजा के लिए मानो वरदान बन कर आया. अब पुत्र वियोग में मरने के लिए पुत्र तो चाहिए ही.
कालांतर में उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति हुई.
ऐसे ही कैकेई को राजा दशरथ से मिले दो वरदान कब अभिशाप में बदल गये उसे पता ही नहीं चला.
जब पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
अप्सरा उर्वशी के प्रणय निवेदन को ठुकरा अर्जुन उसके द्वारा दिये शाप का शिकार हो गया. उसे एक वर्ष की नपुंसकता का शाप मिला.
अर्जुन को मिला यह शाप पांडवों के लिये महा वरदान सरीखा था.
क्योंकि एकमात्र अर्जुन ही ऐसा था जिसे अज्ञातवास में स्वयं को छिपाना सबसे मुश्किल था.
इस शाप के फलस्वरूप अर्जुन बृहन्नला बन स्वयं को छिपाने में सफल रहा.
ऐसे ही ऋषि दुर्वासा द्वारा कुंती को दिया इच्छित देवता दर्शन वरदान कर्ण के रूप में उसके लिये अभिशाप बन गया. वह जीवन भर इस वरदान के कारण तिल तिल मरती रही.
भीष्म को पिता से मिला इच्छा मृत्यु वरदान भी उनके गले की फांस बन गया.
इस वरदान स्वरुप उनसे ना उगलते बनता था ना निगलते.
पूरा जीवन यह महारथी अमरत्व के वरदान को एक शाप की तरह ढोता रहा.
प्राचीन भारतीय साहित्य ऐसे अद्भुत प्रसंगों से भरा पड़ा है…

भाषा

एक भाषा
आधी अधूरी सी
पड़ोसन सी
बनी ठनी
मटक रही है
एक भाषा
अपनी सी
मां सी
उपेक्षित
दर दर
भटक रही है...


पदचाप


चक्रीय मार्ग अवरुद्ध
हो रहा है
सभ्यता का अजगर
केंचुल बदल रहा है
नवचेतना आरोहण
बस होने को है
इतिहास की जमापूंजी
अब खोने को है
मूल्यों का महाप्रयाण
हो रहा है
विद्रोही तेवर
फुसफुसा रहे हैं
बंधन में हाथ पैर
कसमसा रहे हैं
धरा पे सर्वत्र महात्राण
हो रहा है
क्रांति के पुष्प की
सुगंध आ रही है
हवाओं में उत्तेजना
खलबला रही है
गुपचुप कोई महानिर्माण
हो रहा है...





पीपल और गाय

पीपल का अत्यधिक सम्मान हैं.
क्योंकि पीपल जीव की सांसारिक यात्रा जो की एक इंद्रिय जीव अमीबा से पंचेन्द्रिय जीव मनुष्य तक की यात्रा में बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु है. 
पीपल वृक्ष योनि से जीव के छुटकारे का प्रतीक है. 
पीपल वृक्ष योनि का अंतिम पड़ाव है. अब दोबारा वृक्ष होना संभव नहीं. चेतना आगे बढ़ जायेगी.

ऐसे ही गाय पूजनीय है. आज जो गाय है वो कल मनुष्य हो जायेगी. पीपल और गाय बड़े महत्वपूर्ण संधिस्थल हैं. 
ये इतने क्रांतिकारी संधिस्थल है की प्राचीन मनीषियों ने इन्हें अत्यधिक सम्मान दिया है...



सांझ


खंडहर उदास
खड़ा है
समय की रेत पर
परित्यक्त सा
पड़ा है
उसे अब कोई
प्यार नहीं करता
उसके होने ना होने से
किसी को फर्क नहीं पड़ता
खंडहर इस बात को
समझता है
रोज घूरती सी
नजरों को सहता है
खंडहर अब ढह
जाना चाहता है
अपनों से तिरस्कृत
मर जाना चाहता है...


जिम कॉर्बेट

जिम कॉर्बेट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. 
इनके नाम पर उत्तराखंड राज्य में एक विशाल नैशनल पार्क भी स्थित है.

जिम कॉर्बेट को पढना एक रोमांचक अनुभव है. वो एक महान शिकारी और जंगलविद थे. 
दिलचस्प बात यह है की उन्हें पढ़ते वक्त उनकी छवि एक शिकारी के बजाय संत की उभरती है. 

जिम कॉर्बेट ने अनेक पुस्तकों में अपने संस्मरणों को लिखा है. इनमे 'कुमाउं के नरभक्षी', 'रुद्रप्रयाग का आदमखोर', 'जंगल लोर', 'मेरा भारत' आदि प्रमुख हैं.

जिम कॉर्बेट की लेखन शैली इतनी गजब की है की पढने वाला स्वयं को घटनास्थल पर मौजूद पाता है. भारत के जंगलों, गांवों और गांववासियों का ऐसा सजीव चित्रण मिलता है की पढना सार्थक हो जाता है.

'मेरा भारत' में जिम कॉर्बेट खूंखार सुल्ताना डाकू को पकड़ने की तत्कालीन सरकार की मुहिम का अद्भुत वर्णन करते हैं. 

इस वर्णन में सुल्ताना डाकू का चरित्र मार्मिक हो जाता है और उसके प्रति सहानुभूति होने लगती है.

सुल्ताना डाकू के हथियार आज भी नैनीताल के राजभवन में प्रदर्शित हैं और इन्हें देखने का सौभाग्य मुझे कुछ समय पूर्व प्राप्त हुआ था...



मिर्च की लत

कुछ लोग बहुत तेज मिर्च खाते हैं.
कम मिर्च वाला भोजन उन्हें अस्पताल के खाने जैसा लगता है. उनका आग्रह होता है की व्यंजन चाहे जो भी हो तीखा होना चाहिए. उन्हें तीखे और चरपरेपन में ही रस है.
ऐसे लोग मिर्च के लती कहलाते हैं. इन्हें मिर्च खाने का नशा सा सवार रहता है.
अमेरिकन फार्मासिस्ट विल्बर स्कोविल ने सर्वप्रथम मिर्च के चरपरेपन को नापने की इकाई अविष्कृत की.
इसे उनके ही नाम स्कोविल से जाना जाता है.
शिमला मिर्च को जीरो स्कोविल माना जाता है. जबकि एक तीखी भारतीय मिर्च लोटा मिर्च या ततैय्या मिर्च 75000 स्कोविल मानी जाती है. इसे खाने के बाद जलन मिटाने के लिए एक लोटा पानी पीना पड़ता है. लेकिन मिर्च प्रेमी इसके दीवाने हैं.

कहा जाता है की विश्व की सर्वाधिक तीखी मिर्चों में से एक तीखी मिर्च मेक्सिको की हबानेरो है. यह 300000 स्कोविल आंकी जाती है. इसे खाने के बाद सिर चकरा जाता है और काफी देर तक कानो में बहरापन बना रहता है. 
लेकिन तीखेपन में ये मिर्च उत्तर पूर्व भारत में पाई जाने वाली भूत जोलोकिया मिर्च के सामने बच्चा है.
भूत जोलोकिया विश्व की सर्वाधिक चरपरी और खतरनाक मिर्च है. इसे 1000000 स्कोविल तक आंका गया है. यह मिर्च इतनी तीखी है की इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.
कहा जाता है की एक हजार लोगों के लिए बने व्यंजन में चरपनेपन के लिए इस एक मिर्च को डालना काफी रहता है.
यदि कोई जोश में आकर इसका छोटा सा भी अंश खा लेता है तो उसकी हालत अस्पताल जाने जैसी हो जाती है.

मिर्च में कैप्सैसिन नामक रसायन होता है.
जब ये रसायन शरीर में जाता है तो शरीर का सचेतक तंत्र तुरंत मस्तिष्क को अत्यधिक जलन की खतरे की सूचना भेजता है. मस्तिष्क यह सूचना पाते ही एंडोर्फिन नामक जलन शामक तत्व का रिसाव शरीर में कर देता है.
एंडोर्फिन का रिसाव होते ही मनो मस्तिष्क में एक आह्लाद, खुमारी, प्रसन्नता और विश्राम का एहसास होता है.
यह बिलकुल ऐसा है जैसे थोड़ी सी अफीम या गांजे की मात्रा खा ली जाए.
यही है मिर्च का नशा…


विराग

प्रीतम संग नेह का
वियोग खल रहा है
आओ घर लौट चलें
दिन ढ़ल रहा है
मेला बहुत प्यारा है
हर खेल यहां न्यारा है
पर खेल की व्यर्थता का
बोध पल रहा है
मन कभी भरा नहीं
काल भी टरा नहीं
दोनों के अतिक्रमण का
भाव चल रहा है
सांसों पर ध्यान धरें
अंतस उजियार भरें
देह के शिवाले में
आत्मा का दीप जल रहा है...




यात्रा

पहाड़ी झरने सा
चीख रहा हूं 
बहने की कला
सीख रहा हूं
जब नदी बन जाउंगा
तब शांत हो जाऊंगा
थोड़ा सुस्ताऊंगा
अभी तो बेचैन
दिख रहा हूं
सागर के पास पहुंचकर
सहम जाऊंगा
ठहर जाऊंगा
छोड़ कर सब कुछ
जो साथ बहा लाया था
उस विराट में
लीन हो जाऊंगा
मिट जाऊंगा
अपनी कहानी खुद
लिख रहा हूं
पहाड़ी झरने सा
चीख रहा हूँ
बहने की कला
सीख रहा हूं...



उड़ान

मुक्त पखेरू अच्छा लगता है
नील गगन उड़ता फिरता है
वन उपवन दाना चुगता है
ना कोई बंधन ना कोई नियम
इसका जीवन सच्चा लगता है

बादल संग पवन का फिरना
बारिश की बूंदों का झरना
बिन नक़्शे बिन मंजिल यूं ही
एकाकी डग भरते चलना
आनंदित करता है

जो सीखा है उसे भुलाना
कुदरत से गुपचुप बतियाना
फाड़ फाड़ कर पोथी पतरे
अंतर अग्नि को सुलगाना
उल्लासित करता है

मुक्त पखेरू अच्छा लगता है...



शुक्रवार, 10 जून 2016

चाणक्य और चंद्रगुप्त

आचार्य विष्णुगुप्त अपने शिष्य और सेवक शारंगरव को अपनी कृति 'अर्थशास्त्र' लिखवा रहे थे.
आचार्य बोलते जाते और शारंगरव लिखता जाता.
आचार्य ने अपने दूसरे शिष्य मगध सम्राट चंद्रगुप्त को भी बुलावा भेजा हुआ था. 
किसी कारणवश वे चंद्रगुप्त पर क्रुद्ध थे.
सुखस्य मूलं धर्मः , धर्मस्य मूलं अर्थः
अर्थस्य मूलं राज्यं , राज्यस्य मूलं इन्द्रिय जयः
इन्द्रियाजयस्य मूलं विनयः, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवः
वृद्धोपसेवाय विग्न्यानं , विग्न्यानेनं आत्मानं सम्पद्येत
समपदितात्म जितात्मम भवति, जितात्मा सर्वार्थे संयुज्यते
सुख का मूल धर्म है. धर्म का मूल अर्थ है. अर्थ का मूल राज्य है. राज्य का मूल इंद्रिय विजय है. आचार्य लिखवा ही रहे थे की चंद्रगुप्त ने कक्ष में प्रवेश किया.
आचार्य को प्रणाम कर उपस्थित होने का मंतव्य पूछा.
चंद्रगुप्त को देख चाणक्य के माथे पर बल पड़ गये. कड़कती आवाज में पूछा की मगध विजय को जाते समय सेना द्वारा नंदीग्राम प्रवास में ग्रामवासियों से लिए अन्न का मूल्य क्यों नहीं चुकाया गया.
चंद्रगुप्त को जवाब देते नहीं बना. शारंगरव के सामने उन्होंने स्वयं को अपमानित महसूस किया.
चाणक्य ने कठोर स्वर में चंद्रगुप्त से दूसरा प्रश्न किया.
क्या समझ कर तुमने वो अन्न ग्रहण किया. दान या दक्षिणा.
चन्द्रगुप्त के मुंह से बोल ना फूटा.
आचार्य की कड़कती आवाज पुन: गूंजी शारंगरव सम्राट को दान और दक्षिणा का अर्थ समझाओ.
शारंगरव ने बताया. सम्राट दान वह मूल्य है जो सामाजिक कर्तव्य के रूप में दिया जाता है और दक्षिणा वह मूल्य जो किसी सेवा के बदले दिया जाता है.
आचार्य ने चंद्रगुप्त से पूछा तुमने क्या लिया. दान या दक्षिणा.
चंद्रगुप्त ने लज्जित हो कहा कि वे अन्न का मूल्य चुका देंगे.
आचार्य बोले ध्यान रहे चंद्रगुप्त हर वस्तु का मूल्य है. हर सेवा का मूल्य है. और जिसका भी मूल्य है वो अर्थ है. धर्म और काम अर्थ पर ही निर्भर है. इसलिये अर्थ व्यवहार धर्मपूर्वक हो.
बिना मूल्य दिये दूसरे का द्रव्य लेना उसके द्रव्य का अपहरण है. और दूसरे के द्रव्य का अपहरण अपने द्रव्य का नाश है.
चाणक्य की सीख जारी रही. सम्राट अन्न और प्रजा ही तुम्हारा अर्थ है. अन्न का प्रजा से संबंध है. बात समझ में आई.
चंद्रगुप्त ने मरे स्वर में हां बोला.
जा सकते हो. चाणक्य का स्वर भावहीन था.
चंद्रगुप्त मन भर के डग रखता कक्ष से विदा हुआ. 
ह्रदय में ग्लानि भाव था…

अवतार

अजन्मा होने पर भी वो माया स्वरुप जन्मता प्रतीत होता है.
जब जब धर्म का क्षय और अधर्म का आधिपत्य बढ़ता है तब तब वो परम छलिया अवतार लेता है.
समय समय पर वह भिन्न भिन्न अवतार लेता है.
जैसे की -
नित्य अवतार - इस अवतार रूप में छलिया ज्ञानियों, सत्पुरुषों और महात्माओं के रूप में जनमानस में सदा उपस्थित रहता है.

अंशावतार - यहां छलिया अपनी शक्ति के आंशिक रूप में प्रकट होता है. इस अवतार उद्देश्य में वह किसी एक महत कार्य को पूरा करता है.

आवेशावतार - इस अवतार का प्रादुर्भाव भक्त को संकट से उबारने में होता है. भक्त की प्रार्थना, विश्वास और क्रंदन इस अवतार का सृजन करते हैं.

पूर्णावतार - इसमें छलिया अपने पूर्ण वैभव के साथ प्रकट होता है. यह अवतरण दुष्टों के विनाश साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना का परिचायक है.
छलिया कभी भी कहीं भी किसी भी रूप में अवतार ले सकता है. क्योंकि समस्त ब्रह्मांड उसी में व्याप्त है…


सूर्य ग्रहण

आज सूर्य ग्रहण है.
लेकिन पंडित मुरली माधव जी ने कल से ही तैयारी शुरू कर दी थी.
पूजा का बक्सा, लकड़ी का तख़्त, खजूर की चटाईयां और आसन, बांस, लकड़ी के पीढ़े सब सहेज लिया था. 
सुबह सवेरे ही ढुलाई रिक्शा में सामान लाद अपने सात बरस के एकमात्र पुत्र कान्हा के संग गंगा किनारे आ डटे थे.
यहां घाट सजेगा. पंडित मुरली माधव जी और कान्हा का घाट.
पंडित जी का रंग सांवला और खिचड़ी दाढ़ी थी. उम्र कोई पैंतालीस के लगभग. केवल शिखा, जनेऊ और चंदन तिलक से ही उनके पंडित होने की पुष्टि होती थी अन्यथा वे पंडित नहीं लगते थे.
ग्रहण ग्यारह बजे शुरू होगा. पूर्ण ग्रहण है सो लंबा चलेगा. अमावस्या है भगतों की भारी भीड़ होगी. जप तप ध्यान पूजा उपाय सब होगा. आज फुरसत नहीं मिलेगी.
पंडित जी काम में जुटे हैं. बांस गाड़ उनके मध्य खजूर की चटाईयां बांध घाट का परिसर बनाया. परिसर में प्रवेश के एक तरफ तख़्त डाल उसपर दरी बिछा पूजा का बक्सा जमा दिया.
पंडित जी का आसन तैयार था. शेष परिसर में बची चटाईयां आसन और पीढ़े रख दिये.
इस बीच कान्हा धीरे धीरे गंगा किनारे उमड़ते लोगों के हुजूम को देखता इधर उधर कूद रहा था.
सब तैयारी कर पंडित जी गंगा स्नान को चले.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करते तीन डुबकियां मारी और कृष्ण कृष्ण कहते जल से बाहर आ गये. नवंबर का महीना था ठंडी आरम्भ हो गयी थी.
जल बरफ सा शीतल था.
जल्दी से वस्त्र बदले और पूजा के बक्से में से लड्डू गोपाल की प्रतिमा निकाल उन्हें भी तीन डुबकियों का स्नान करा दिया.
जनसमूह बढ़ता ही जा रहा था. कई तो पंडित जी के घाट पर झांक भी गये थे.
पंडित जी ने अब स्नान के लिये कान्हा को आवाज दी.
कान्हा ना नुकुर करने लगा तो पंडित जी ने मीठी झिड़की दी.
जब हमारे लड्डू गोपाल सुबह सवेरे स्नान कर सकते हैं तो तुम क्यों नहीं.
जल्दी से डुबकी मारो और पूर्वाभिमुख बैठ कर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जपो. जल्दी करो
भगत लोग आते ही होंगे.
शन: शन: परिसर में काफी लोग जमा हो गये.
स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े तमाम लोग. पंडित जी किसी को यौगिक क्रिया बतलाते तो किसी की पूजा करते कोई उपाय पूछता था तो कोई राहु से त्रस्त था.
पंडित जी सबका कल्याण कर रहे थे साथ ही साथ ग्रहणकाल में गंगा स्नान की महत्ता भी समझाते जाते.
कान्हा अपने समवय बच्चों संग खेल में मगन था.
पंडित जी को नकद दक्षिणा के संग फल मिठाई और वस्त्रों की खूब प्राप्ति हो रही थी.
खाद्य सामग्री पर पंडित जी कुशा और तुलसी दल रखते जाते यूं सामग्री को ग्रहण दोष नहीं लगता.
चारों तरफ अद्भुत दृश्य था. कोई कमर तक जल में खड़ा हो नारियल बहाता था तो कोई एकाग्रचित्त हो मन्त्र जपता था. कोई केवल स्नान करके ही प्रसन्न था. सब अपनी धुन में लगे थे. सबके नवग्रह शांत हो रहे थे.
पंड़ित जी आज ख़ुशी से फूले ना समाते थे. मुख से बारम्बार कृष्ण कृष्ण भज रहे थे.
सांझ होते होते मेला छटा. भगत लोग घर को चले.
पंडित जी का ढुलाई रिक्शा भी आ पहुंचा. चटपट घाट उखाड़ रिक्शे पर लाद दिया गया.
आगे आगे रिक्शा और उसके पीछे कान्हा की उंगली पकड़े पंडित जी मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को हजार धन्यवाद देते घर की ओर जा रहे थे.
बहुत दिनों बाद आज मुफलिसी से ग्रहण जो हटा था…

बोध


गली मोहल्ले में
कंचे लट्टू खेलकर
आते जाते मौसमों की
धूप बारिश झेलकर
मैं बड़ा तो
हो गया हूं
परन्तु अर्थशास्त्र के
मकड़जाल में
खो गया हूं
अब भागता सा दिन है
और जागती सी
रातें हैं
परकटे एहसास
पल पल कराह्तें हैं
दिल से मूंह फेरकर
दिमाग की तरफ
हो गया हूँ
पढ़ पढ़ कर पोथियां
क्या पा लिया है
मोम को स्वार्थ ने
पत्थर किया है
समीकरण के घाट पर
संवेदना को
धो गया हूं...


ताड़पत्रों पर लिखा भविष्य

नाड़ी ताड़पत्र फलादेश अपने आप में एक अत्यंत रहस्मय प्राचीन भारतीय विधा है. 
इसमें अगस्त्य, कौशिक, काक भुजंदर, अत्री, नंदी आदि अनेक ऋषियों द्वारा मानव मात्र के लिए किया गया भविष्य फलादेश निहित है.

नाड़ी ताड़पत्र फलादेश ज्योतिष नहीं है. 
यद्यपि इसमें जातक की दशाओं और गोचर का विवरण मिलता है जो केवल प्रासंगिक है. 

यह दिव्य वाक्य है जो की भगवान् शिव और मां पार्वती के मध्य हुआ जातक संबंधी वार्तालाप है.
मां पार्वती भगवान् शिव से जातक संबंधी प्रश्न पूछती हैं और भगवान् उसका जवाब देते हैं.
इस वार्तालाप में जातक के संबंध में इतनी विशद जानकारी उपलब्द्ध होती है की वो वर्तमान जन्म का अतिक्रमण कर जाती है.
भगवान् द्वारा व्यक्ति की समस्या उसके कारण और परिहार के बारे में विस्तृत रूप से बताया जाता है.

दक्षिण का वैतीस्वरण कोईल इस विधा का गढ़ है. हालांकि देश के सभी प्रमुख नगरों में इनके केंद्र हैं.
दैवयोग से मुझे इस विधा का अच्छा खासा अनुभव प्राप्त हुआ है और मैं इसके प्रति नतमस्तक हूं.

(जैसा की जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज नक्कालों का अस्तित्व है वैसे ही ये विधा भी ठगों की भेंट चढ़ चुकी है. कृपया सावधानी रखें)



गरुड़ पुराण और तिबतेन बुक ऑफ़ डेड

तिब्बत संसार का एक मात्र देश है जहां व्यक्ति की मृत्यु निकट जान उसे परलोक के लिये प्रशिक्षित किया जाता है. 
मरणासन्न व्यक्ति को क्रमवार वो स्थितियां बताई जाती हैं जिनका सामना वो मरने के बाद करेगा. 

'तिब्तेन बुक ऑफ़ डेड' में जीव की मृत्योपरांत परलोक यात्रा और स्थितियों का रोमांचकारी विवरण है. 

ऐसी ही एक किताब भारत में भी है जिसे 'गरुड़ पुराण' कहते हैं. इसमें भी जीव की मृत्योपरांत परलोक यात्रा का विवरण है.
'गरुड़ पुराण' को हिन्दू किसी संबंधी के देहांत के बाद मृतात्मा की शांति के लिए सुनते हैं. जबकि इसके पाठ का उद्देश्य जीवितों को सन्मार्ग पर चलाना है.

मृत्यु बाद जीव की परलोक संबंधी यात्रा और अनुभवों पर गहन शोध करने वाले पाश्चात्य विद्वान् रेमंड मूडी की 'जीवन के बाद जीवन' भी एक बहुत ही दिलचस्प पुस्तक है. इसमें उन सैंकड़ों लोगों के अनुभव संकलित हैं जो मरने के कुछ समय बाद पुन: जीवित हो गये थे.

परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा 'योगी कथामृत' भी पारलौकिक जीवन और रहस्यों को आश्चर्यजनक ढ़ंग से उद्घाटित करती है...



आइसक्रीम का धोखा है फ्रोजन डेजर्ट

आपके परिवार ने आईसक्रीम खाने की इच्छा जाहिर की और आप बाजार गये और बढ़िया सी आईसक्रीम ले आये. 
लेकिन आपको जान कर कैसा लगेगा की जिसे आप आईसक्रीम समझ रहे हैं वो आईसक्रीम है ही नहीं.

जी हां यही सच्चाई है. देश में ज्यादातर आईसक्रीम निर्माता कम्पनियों द्वारा आईसक्रीम बनाई ही नहीं जाती. 

'प्रिवेंशन ऑफ़ फ़ूड एडेलट्रेशन एक्ट 1954' के अनुसार आईसक्रीम शब्द केवल उसी उत्पाद पर लिखा जा सकता है जिसमे एक निश्चित मात्र में डेयरी क्रीम और डेयरी बटर का समावेश हो.

लेकिन आईसक्रीम निर्माता लागत कम करने के लिए डेयरी क्रीम और बटर की जगह सस्ते पाम आयल से बनी मार्जरीन का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इनके द्वारा निर्मित उत्पाद को 'फ्रोजन डेजर्ट' का नाम दिया जाता है. यही पैकिंग पर लिखा भी होता है. लेकिन आम आदमी को इसका पता ही नहीं.

अगली बार आप जब आईसक्रीम खरीदें तो देख लें की पैक पर आईसक्रीम लिखा है या फ्रोजन डेजर्ट...



यक्ष

यक्ष भारतीय मिथकीय योनियों जैसे की देव, नाग, किन्नर, प्रेत, गंधर्व, राक्षस आदि में से एक हैं.
पौराणिक साहित्य में इन्हें अर्ध देवयोनि कहा गया है. देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर इनके राजा हैं. 
यक्ष एक क्रूर और ह्रदयहीन योनि मानी जाती है. 

मनुष्यों द्वारा इनका उपयोग अपने धन की रक्षा के लिए किया गया है. 
प्राचीन समय में राजा महाराजा अपने खजाने की रक्षा के लिए यक्ष विशेष को पूजा द्वारा आमंत्रित कर खजाने की रक्षा का भार सौंप देते थे. 
इस प्रकार कीलित हुआ खजाना सदा सुरक्षित रहता था ऐसी मान्यता थी. 

इसी विश्वास के चलते दिल्ली स्थित भारतीय रिजर्व बैंक के द्वार पर कंक नामक यक्ष और सहधर्मिणी यक्षिणी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है...



पढ़ाई

चौधरी रामेश्वर सिंह की पुत्री का विवाह है.
मशहूर हलवाई गणपत घर आया हुआ है. दावत के सामान की लिस्ट बन रही है. सात सौ के लगभग कुल मेहमान रहेंगे. तीन सौ बाराती और चार सौ घराती. चौधरी साहब की ताकीद है खाना बढ़िया बनना चाहिये.
चौधरी साहब मध्यमवर्गीय आदमी हैं. बहुत अमीर नहीं तो गरीब भी नहीं. आमदनी का मुख्य स्रोत किराया है. दस बारह दड़बे नुमा कमरे और दो छोटे फैक्ट्री शेड के किराये से जिंदगी मजे में गुजर रही है.
गणपत ने सामान की छपी छपाई लिस्ट में मात्रा लिखी और सादे कागज पर बनी एक दूसरी लिस्ट के साथ चौधरी साहब को पकड़ा दी.
एक लिस्ट में किराने के सामान और दूसरी में फल सब्जी दूध दही ईंधन आदि का ब्यौरा है.
गणपत को किराने का सामान और ईंधन आज ही चाहिए. कल सुबह वह अपनी टीम के साथ काम शुरू कर देगा. विवाह परसों है पर मिठाईयां कल सुबह से ही बननी आरंभ हो जायेंगी.
जाते जाते गणपत चौधरी साहब को ध्यान दिलाता गया की उसे चीनी मवाने की बेसन राजधानी का और घी पनघट ही चाहिये.
हालांकि लिस्ट में लिखा है फिर भी उसने याद दिलाना बेहतर समझा. साथ ही कहता गया की दो चार जगह भाव पूछकर ही सामान लेना. ज़माना बड़ा खराब है.
चौधरी साहब लिस्ट और नोटों की गड्डी जेब में ठूंस शहर के मुख्य बाजार की ओर रवाना हुए.
इतनी बड़ी खरीदारी का उन्हें पहले कोई अनुभव ना था. होशियारी से खरीदारी करना चाहते थे. सच में जमाना बड़ा खराब है. ना जाने कौन कब कहां ठग ले.
शहर के मुख्य बाज़ार पहुंच किराने की दुकानों को तकते घूमने लगे.
एक दुकान पर रुक मवाना की चीनी का भाव लिया. दुकानदार ने 3000 रूपए की बोरी बताई.
वहां से चल अगली दुकान पर पहुंचे. मवाना की चीनी 3050 और राजधानी बेसन 2400 रूपए कट्टे का भाव मिला.
सोचने लगे बड़ा दुष्ट है चीनी महंगी बता रहा है. तीसरी दुकान पर पहुंचे. मवाना की चीनी 3000 राजधानी बेसन 2450 और पनघट घी का टीन 1350 रूपए.
ये वाला भी कुछ जमा नहीं. बिना बात बेसन में 50 रूपए ज्यादा घुसेड़ दिये.
सच में सही सौदा लेना बड़ा ही मुश्किल काम है.
धूप चढ़ आई थी और सामान काफी लेना था. घर पर भी हजारों काम थे. चौधरी साहब एक अन्य दुकान पर पहुंचे.
यह दुकान लाला मगनलाल की थी. लाला जी ने मुस्कुरा कर चौधरी साहब का स्वागत किया. साथ में उनका पुत्र गोपी बैठा था. बारहवीं करा लाला जी ने उसे पिछले हफ्ते से ही दुकान पर अपने साथ बिठाना शुरू किया था.
चौधरी साहब ने मवाना की चीनी का भाव पूछा. लाला जी ने बड़े ही विनयशील स्वर में 2900 रूपए का भाव बताया. राजधानी बेसन 2350 और पनघट घी 1300 रूपए बताया.
गोपी ने अचरज से पिता की ओर देखा.
चौधरी साहब ने चैन की सांस ली. थोड़ा घूमना तो पड़ा मगर पहुंच गये सही जगह. उन्होंने किराने वाली लिस्ट लाला जी को पकड़ा दी और एक कुर्सी पर खुद को ढीला छोड़ दिया.
लाला जी ने पूछा घर में शादी है. हां बिटिया की शादी है. इशारा पाते ही नौकर भाग कर चौधरी साहब के लिये लस्सी ले आया.
गोपी लिस्ट पढ़ कर का सामान निकलवाने लगा. मेवे , मसाले , दालें , चावल , देसी घी , केसर , मैदा और भी ना जाने क्या क्या. बहुत बड़ी लिस्ट थी.
सब सामान निकल गया तो लाला जी ने थ्रीव्हीलर बुलवा दिया. चौधरी साहब ने भुगतान किया और सामान लेकर चले गये.
ग्राहक के जाने के बाद नौकर को इधर उधर कर गोपी ने पिता से पूछा पापा आपने चीनी बेसन और पनघट के भाव कम क्यों बताये.
चीनी तो आपने खरीद से भी कम में बेच दी.
लाला जी मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले मवाना की चीनी सुनते ही मैं समझ गया की यह शादी की खरीदारी है.
चीनी बेसन पनघट के भाव तो चूहेदानी हैं बेटा.
असली राज तो बाकी लिस्ट में छिपा है. जरा अपनी वाली रेट लिस्ट तो चेक कर.
गोपी ने लिस्ट देखी तो सब जमा घटा समझ में आ गया.
आज उसे दुकान पर बैठने में पहली बार मजा आ रहा था...

अवसर

आदमी चौराहा है
इससे हर तरफ
मार्ग जाता है
गिरने उठने
ठहरने चलने के
चुनाव द्वारा
खुद को कहीं भी
पहुंचाता है
इसके पास
विकल्प है
भटकाव की संभावना
अति अल्प है
यदि विवेक को
उंगली पकड़ाता है
आदमी परतंत्र है
परन्तु परतंत्रता में
स्वतंत्र है
प्रारब्ध की झील में
स्वेच्छा की नाव
चलाता है...



उद्घोष

धरा को
लिटाकर
आकाश को
बिठाकर
सूरज को
बर्फ का
आईना दिखाकर
दिशाओं को
उनके
अंधकार में
जलाता हूं
मैं समय को
गोद में
खिलाता हूं
अतीत और
भविष्य को
खूंटी पर
टांगा है
मौन से
थोड़ा सा
विद्रोह
मांगा है
रेत की
कनी में
सागर
सुखाता हूं...



मर चुका है च्यवनप्राश फॉर्मूला

सर्दियां शुरू होते ही भारतीय घरों में च्यवनप्राश का सेवन किया जाना आम बात है. 
शायद ही कोई ऐसा घर होगा जो टॉनिक के तौर पर च्यवनप्राश का सेवन ना करता हो. 

च्यवनप्राश 54 प्रकार की जड़ी बूटियों से मिलकर बनने वाला फ़ॉर्मूला है. 
इसमें अष्टवर्ग समूह की आठ हिमालयी जड़ी बूटियां जैसे की रिद्धि, वृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली और क्षीरकाकोली आधारभूत अतिआवश्यक घटक तत्व की भूमिका निभाती हैं. 

लेकिन दुर्भाग्यवश अत्यधिक पर्वतीय दोहन और अनियंत्रित विकास की प्रक्रिया स्वरूप ये जड़ी बूटियां वर्षों पहले लुप्त हो चुकी हैं. यही नहीं बल्कि च्यवनप्राश में पड़ने वाली अन्य चौबीस प्रकार की जड़ी बूटियां भी लुप्तप्राय हैं.

ऐसे में कहा जा सकता है की च्यवनप्राश फ़ॉर्मूले की बरसों पहले मौत हो चुकी है.

लेकिन आज भी बाजार में च्यवनप्राश बिक रहा है...



प्राचीन भारत के ठग


ठग संस्कृत शब्द स्थग का अपभ्रंश है. इसका अर्थ है चोर या बदमाश.
भारत सैंकड़ों सालों से इन ठगों से आक्रान्त था. लम्बी यात्रायें अत्यंत जोखिमपूर्ण थीं. गंतव्य तक ना पहुंचने वाले यात्रियों का प्रतिशत अत्यधिक था.

ये ठग पांच या छह के समूह में मार्गों पर यात्री बन घूमते रहते थे.
ये स्वयं को मुस्लिम कहते थे पर मां काली को पूजते थे. इनके रीति रिवाज हिन्दू मुस्लिम मत का इतना घालमेल लिए हुए थे की कभी स्पष्ट ही नहीं हुआ की इनका वास्तविक धर्म क्या था.

शिकार मिल जाने पर ये स्वयं को मूढ़ और जाहिल जाहिर करते और उससे किसी धार्मिक क्रिया कलाप संबंधी सहयोग मांगते. शिकार इनकी बातों में आ जाता. तब इनमे से कोई 'तमाखू लाओ' का उद्घोष करता. जिसका कूट अर्थ था शिकार का ध्यान बटाना.
जैसे ही शिकार का ध्यान बंटता एक रुमाल से उसका गला घोंट देता.

शिकार के मृत शरीर को गड्ढा खोद जमीन में दबा उसके ऊपर ये उत्सव मनाते थे.

जमीन खोदने कि गैंती और शक्कर इनके पवित्र उपकरण थे. गैंती शव को दफ़नाने के लिए और शक्कर उस स्थान पर चींटियों को आमंत्रित करने के लिये ताकि शव को चींटियां ठिकाने लगा दें.

लार्ड विलियम बैंटिक के अथक प्रयासों द्वारा इन पर काबू पाया गया. हजारों को पकड़ा गया. सैंकड़ों फांसियां हुई. बचे खुचों को नितम्बो पर मोहर लगा सरकारी गवाह बनाया गया.
इस प्रकार इनका उन्मूलन हुआ...


स्वीकृति

दौड़ का नहीं अर्थ कोई 
अहम वर्तुल में खड़ा है 
कामना की चौखटों पर 
अतृप्ति का ताला जड़ा है

आदमी इक कशमकश है
भाग्य के आगे विवश है
भूल कर यह कटु सत्य
स्वयं से कितना लड़ा है

लालसा की आंख नहीं है
अभीप्सा को पांख नहीं है
स्वर्ण मृग का लोभ आखिर
सीता को महंगा पड़ा है

चाहना का घड़ा फूटा
चेष्टा का भरम टूटा
अर्जुन के हर कृत्य पर
कृष्ण का पहरा कड़ा है… 



स्वाभिमान

सुरेश को घर के पास वाले शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में वह अक्सर दिख जाती.
दीन हीन मरियल सी चेहरे पर बेचारगी के भाव लिये वह बूढ़ी घूम घूम कर भीख मांग रही होती.
उसे देख सुरेश द्रवित हो जाता. बूढी को कुछ देने के लिये उसका हाथ स्वयमेव जेब में चला जाता.
हालांकि वह खुद आजकल बेरोजगार चल रहा था और बुरी तरह आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. पिछली नौकरी कम्पनी में हुई व्यापक छंटनी की भेंट चढ़ गई थी और आज चार महीने बाद भी वो खाली था. शहर में नौकरियों का मानो अकाल सा पड़ा था.
वह बूढी भिखारन उसके दिमाग में हलचल मचा देती और उसे ईश्वर पर क्रोध आ जाता. उफ्फ कैसी दुनिया बनाई है ऊपर वाले ने.
बूढ़े अशक्त और लाचार लोग पेट की खातिर भीख मांगते घूम रहे हैं. बाजारों में तिरस्कृत हो रहे हैं. कैसा वीभत्स संसार है.
लेकिन उसे संतोष भी होता की दुनिया में भले लोग भी हैं.
जब उसे पता चला था की वैष्णव ढाबे वाला बूढी को काफी समय से मुफ्त खाना खिलाता आ रहा है तो उसे बहुत खुशी हुई थी.
ढाबे वाले ने बूढी से कह रखा था की वो जब भी इस तरफ आये दो रोटी उसके ढाबे पर खा लिया करे वह पैसे नहीं लेगा.
ऐसे ही एक बार राजू पनवाड़ी को उसने शाम को बूढी को आधा लीटर दूध की थैली देते देखा था.
पूछने पर राजू ने बताया था की बूढी पर तरस खाकर वह उसे पिछले कई महीनों से दूध देता आ रहा है. यही नहीं उसके बगल का सब्जी वाला भी जब तब बूढी को सब्जी फल आदि दे दिया करता है.
आह ! इन्हीं जैसे विशाल हृदयों की वजह से धरती टिकी है. वरना कभी की रसातल में डूब जाती.
सुरेश को कुछ फोटोकॉपीज करानी थी. वह पेपर्स इकट्ठे कर ही रहा था की मकान मालिक गुप्ता जी की आवाज कानों में पड़ी. कैसे हो सुरेश बाबू.
गुप्ता जी भले आदमी थे. दूसरों का दुखदर्द समझने वाले. दो महीने से सुरेश ने किराया नहीं दिया था पर गुप्ता जी ने उसे कभी टोका नहीं. वह उसकी मजबूरी समझ रहे थे.
मेरा एक काम करोगे. सुप्रीम इलेक्ट्रिकल वाले से बिजली का कुछ सामान लाना है. अगर उस तरफ जाना हो तो कष्ट कर लेना. अरे कष्ट कैसा सर जरूर और उसने गुप्ता जी से पर्ची और पैसे ले लिये.
सुरेश जब सुप्रीम इलेक्ट्रिकल्स पहुंचा तो चकित रह गया.
वहां बूढी बैठी सिक्कों की मीनारें बना रही थी. एक दो पांच और दस के सिक्कों की मीनारे.
साथ ही ढेर सारे पांच दस बीस और पचास के नोटों की तहें.
दुकानदार ने फटाफट सिक्के और नोट गिने और उनकी एवज में एक पांच सौ का और तीन सौ सौ के नोट बूढी के हवाले कर दिये. बूढी नोट लेकर फ़ौरन ही वहां से निकल गई.
सुरेश से रहा नहीं गया उसने दुकानदार से बूढी के बारे पूछा.
दुकानदार ने बताया बूढी अच्छे घर से है. दो बेटे हैं और तारकोल बिछाने का काम करते हैं. अपना घर है. घर में ट्रैक्टर आदि भी है.
पर ये बुढ़िया बहुत स्वाभिमानी है. घर टिकती ही नहीं. कहती है बैठ कर नहीं खा सकती. लड़के इसके आगे मजबूर हैं.
हमारी दुकान का फुटफॉल अच्छा है. सिक्कों और छोटे नोटों की हमेशा कमी रहती है.
इस बुढ़िया का बड़ा सहारा है. रोज सात आठ सौ का छुट्टा दे जाती है.
अगर कोई तीज त्यौहार हो तो इसका कलेक्शन हजार बारह सौ तक चला जाता है.
हम पर इसका बड़ा विश्वास है. हमारे अलावा और किसी को छुट्टा नहीं देती.
यह सुनते हुए सुरेश को लगा जैसे कान बहरे हो गये हों.
हवा को अचानक किसी ने फाड़ दिया था.
स्वाभिमान निर्लज्जता बेहयाई आपस में टकराते हुए दिमाग में धमाके करने लगे थे…

सुख

दिन भर जूता पहने
वो बहुत कष्ट पाता था
क्योंकि जूता काटता था
उसकी जिन्दगी में
कोई रंग नहीं था
कोई भी तो
उसके संग नहीं था
पत्नी बच्चे दोस्त
सबसे उपेक्षित
वो खुद से ही
खुद के सुख दुःख
बांटता था
मेरे पूछने पर की
तुम नया जूता
क्यों नहीं लेते
इसे बदल क्यों
नहीं देते
वो उदास होकर कहता
रात जब जूता
उतारता हूं
बड़ा ही सुख पाता हूं
बस एक यही सुख तो
जिन्दगी में बचा है
दुखों से चौतरफा
घिर जाने पर
सुख के इस एहसास को
मैंने खुद ही रचा है...



स्थिति

अजर अमर अविनाशी
पंचतत्वी 
छकड़े पर
सवार है
कहीं पहुंचने को
बेक़रार है
कस्तूरी हिरण सा
बौराया फिरता है
भावनाओं के
समुन्दर में
डूबता
तिरता है
ये जरुर किसी
शाप को
ढो रहा है
वर्ना
मनुष्यता के
चौराहे पर खड़ा
क्यों रो रहा है...



मनाली हिडिम्बा राक्षसी का घर

पांडवों के वनवास के दौरान एक बार भीम की मुठभेड़ हिडिम्ब नामक राक्षस से हुई. 
हिडिम्ब बहुत ही भयानक राक्षस था और मनुष्यों को मार कर खा जाना इसे बहुत पसंद था. 
ये अपने समय का अजेय राक्षस था. 
इसकी बहन हिडिम्बा का प्रण था की जो उसके भाई को पराजित कर देगा उसी शूरवीर से वो विवाह करेगी. 

महाबली भीम की हिडिम्ब से मुठभेड़ आज के हिमाचल प्रदेश के मनाली नामक स्थान पर हुई और भीम ने उसे मार गिराया था. 

महाभारत अनुसार हिडिम्बा जो की एक मायावी राक्षसी थी भीम के साथ प्रणय सूत्र में बंधने पर भीम को आकाश मार्ग से बर्फ से ढकी पहाड़ी चोटियों, झरनों और फलों से लदे वृक्षों वाले अपने इलाके का आनंद पूर्वक भ्रमण कराती थी.

यह भौगोलिक स्थिति मनाली का सटीक वर्णन करती है.

मनाली में व्यास नदी के किनारे मां हिडिम्बा का अति प्राचीन मंदिर स्थित है. मनाली के मूल निवासी इन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं और बिना इनका आशीर्वाद लिए कोई भी शुभ काम नहीं करते...



अनोखी चित्रकार

सत्रहवीं शताब्दी में इटली के फ्लोरेंस शहर में आर्तेमीसिया जेंटिलेशी नामक एक महिला चित्रकार हुई. 
यह सम्पूर्ण विश्व में आज तक हुई अपने आप में अकेली अनोखी चित्रकार है.

इस महिला चित्रकार ने कुल 27 चित्र बनाये. सभी अपने आप में अनोखे. 
इन चित्रों में एक औरत पुरुष को बड़े ही हिंसात्मक तरीके से मारती पीटती चित्रित की गई है. पुरुष के बाल नोचना, डंडे से पीटना, छुरा घोंपना और सर में मोटी मोटी कील ठोकने जैसे दृश्य चित्रित किये गये हैं.

जिस भी हिंसात्मक तरीके से पुरुष को पीटा और अपमानित किया जा सकता है वो सब उसने चित्रित किया.

कहते हैं की उसके पिता के एक अधेड़ दोस्त ने उसका कम उम्र में ही बलात्कार कर दिया था. बलात्कार की अमानवीय पीड़ा और उसके बाद चले मुकद्दमे की बहसबाजी ने उसे तोड़ दिया. उसके मन में पुरुषों के प्रति असीम घृणा भर गई.

आर्तेमीसिया के चित्रों में पुरुषों के चेहरे तो भिन्न भिन्न हैं लेकिन उन्हें पीटती स्त्री का चेहरा एक ही है जो की उसकी स्वयं की शक्ल से मिलता जुलता है...




किन्नरों के भगवान अरावन

महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार पांडवों को विजय के लिए नरबली की आवश्यकता पड़ी. लेकिन स्वयं की बलि देने के लिए कोई भी प्रस्तुत नहीं हुआ.
संकट की इस घड़ी में अर्जुन की नाग पत्नी उलूपी का पुत्र इरावान स्वयं की बलि के लिए आगे आया.

लेकिन इरावान की एक शर्त थी की वो विवाहित मरना चाहता था.
जिसे कल मर जाना है उससे कौन शादी करेगा. फलस्वरूप कोई कन्या उससे विवाह के लिए तैयार नहीं हुई.

ऐसे में भगवान् श्री कृष्ण ने मोहिनी रूप बनाया और इरावान से विवाह कर उसके साथ रात बिताई.

भारत का हिजड़ा समुदाय इसी कथा को आत्मसात कर श्री कृष्ण के योनि संयोजन में स्वयं को देखता है और इरावान को अपना देवता और पति मानता है.

तमिलनाडु के वेल्लुपुरम जिले के कूवगम गांव में इरावान देवता का मंदिर है.
हर साल तमिल वर्ष की पहली पूर्णिमा को इस मंदिर में 18 दिवसीय कार्यक्रम मनाया जाता है. इसमें हजारों हिजड़ों द्वारा उनके देवता इरावान से विवाह किया जाता है. लेकिन अगले दिन ही मंगलसूत्र तोड़ और महाविलाप के बीच इरावान की प्रतिमा को भग्न कर हिजड़ों द्वारा विधवा वेश धारण कर लिया जाता है.

इरावान को अरावन भी कहते हैं. समस्त हिजड़े स्वयं को उसकी विधवा मानते हैं...


अम्मा

वो दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट बहुत प्रसिद्द था.
हमेशा ग्राहकों से भरा रहता.
इस रेस्टोरेंट की किचन में महिलायें भी काम करती थीं. 
एक अधेड़ उम्र की दक्षिण भारतीय महिला किचन की हेड थी. सभी रेसिपीज उसी के द्वारा सेट की गई थीं.
कर्मचारी उसे अम्मा कह कर बुलाते थे.
अम्मा दिन भर किचन में अपने सहयोगियों के साथ व्यंजन बनाने में लगी रहती.
गुणवत्ता के साथ त्वरित सेवा यही रेस्टोरेंट का ध्येय था.
एक दोपहर ग्राहकों का दबाव चरम पर था और बाहर भी कुछ लोग अपनी बारी के लिये प्रतीक्षारत थे. वेटर भाग भाग कर सर्विस दे रहे थे.
तभी रेस्टोरेंट का एक हेल्पर लड़का कुछ लिफ़ाफ़े लेकर किचन में घुसा.
एक क्षण को किचन में सन्नाटा सा छा गया. बर्तन बजने की आवाजें अचानक शांत हो गईं.
और फिर जैसे प्रलय आ गई.
अम्मा फर्श पर बर्तन पटक चीखती हुई किचन से बाहर निकली.
ग्राहकों को मानो सांप सूंघ गया.
अम्मा चीख रही थी - 'हद होती है बर्दाश्त की भी. भाड़ में जाये ऐसी नौकरी. इस बार भी कोई इनक्रीमेंट नहीं. शोषण की भी कोई सीमा है'.
'मुझे नहीं करनी यह गुलामों जैसी नौकरी'.
कहकर एप्रन फेंकती अम्मा रेस्टोरेंट से बाहर को भागी. 'ना इन्क्रीमेंट ना टाइम पर सेलरी सम्हालो अपनी धर्मशाला'.
तभी रेस्टोरेंट के पीछे ऑफिस से एक नौजवान बदहवास सा दौड़ता हुआ आया. यह रेस्टोरेंट का मालिक था.
उसने हेल्पर लड़के को गुस्से से देखा और चीखा - "यू इडियट ! मैं वो एनवलप्स तुझे शाम को देने को बोला था" और तेजी से अम्मा के पीछे बाहर भागा.
लोग बड़ी दिलचस्पी से यह नजारा देख रहे थे.
नौजवान अम्मा की अनुनय विनय कर मनाने की कोशिश करने लगा. पर अम्मा थी की टस से मस नहीं हो रही थी और काम ना करने की जिद पर अड़ी थी.
काफी देर यह सब चलता रहा.
लोगों के आश्चर्य की तब सीमा ना रही जब उन्होंने रेस्टोरेंट मालिक को कहते सुना "ओफ्फोह लोग देख रहे हैं. अब मान भी जाओ ना मम्मी".
और मम्मी पिघलते हुए बोली 'नालायक ! बिलकुल अपने पापा पर गया है'…

मनहूस

दोपहर के बारह बज गये थे पर अभी तक एक भी बिल नहीं कटा था.
सोमेश को समझ में नहीं आ रहा था की यह हो क्या रहा है.
कल भी मात्र चालीस हजार की सेल हुई थी. परसों भी कुल दो ही बिल बने थे. सेल दिनोंदिन गिर क्यों रही है.
यही हाल रहा तो कम्पनी अपना खर्चा कैसे निकालेगी.
सोमेश ड्राई फ्रूट्स , हर्ब्स और मसालों का इंस्टीट्यूशनल सप्लायर था.
तमाम बड़े होटल्स और फ़ूड कंपनीज उससे माल लेती थीं.
सालों साल कठोर मेहनत कर उसने अपने बिजनेस को खड़ा किया था.
कुछ दिन पहले उसने चाईनीज हर्ब्स की डायरेक्ट परचेज के लिये चाइना टूर भी किया था. इससे उसकी हर्ब्स की परचेज काफी सस्ती हो गई थी.
रेट्स क्वालिटी पॉलिसी किसी भी चीज में उसने कोई परिवर्तन नहीं किया था.
ना ही बाज़ार में कोई नया सप्लायर ही आया था. फिर ऐसा क्यों हो रहा है.
सोमेश दिमाग पर बार बार जोर डालता और सोचता. आखिर पिछले डेढ़ दो महीनों में ऐसा क्या हो गया है की उसकी दो लाख रूपए रोज की सेल चालीस पचास हजार पर अटक गई है.
रह रह कर उसके दिमाग में एक ही चेहरा कौंधता मिथिलेश दास.
मिथिलेश ने उसे डेढ़ महीना पहले ज्वाइन किया था. मिथिलेश बीएससी एमबीए था पर शकल से गंवार लगता था.
मिथिलेश डिलिवरी सुपरवाईजर था. ऑर्डर्स को बिल करा कर कम्पनी की गाड़ियों में लोड कराना उसका काम था.
मिथिलेश उसे अजीब लगता था.
ना कपड़े पहनने का शऊर ना खाने पीने का.
झोलझाल सा पहनावा तेल चुपड़े बाल और चाय भी सुड़क कर पीता था.
हालांकि अपने काम में उसने कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया था.
सोमेश का शक गहराने लगा.
हो ना हो मिथिलेश ही गड़बड़ है. किसी किसी के पैर अशुभ होते हैं.
जहां पड़ते हैं वहीँ भट्ठा बैठ जाता है.
और फिर मिथिलेश ने उसे बताया भी तो था की उसके माता पिता बचपन में ही गुजर गये थे. चाचा के घर कैसे वह अभावों में पला था. फिर चाचा भी चल बसे.
कितनी मुश्किलों में उसने अपनी पढ़ाई की है.
और तो और जिस दिन उसने ज्वाइन किया था उसी दिन कम्पनी की एक डिलिवरी वैन भी एक्सीडेंट हुई थी.
हां यही है.
जब से इसने ज्वाइन किया है तभी से सेल टूटी है.
इसका कुछ करना पड़ेगा. रिस्क नहीं लिया जा सकता.
भले कामकाज में ठीक है पर मनहूस है. कुछ दिन यहां रुक गया तो बेड़ा गर्क कर देगा.
सोमेश ने एकाउंटेंट को बुलाया और मिथिलेश का टर्मिनेशन लैटर और हिसाब बनाने को कहा.
आज तक की सेलरी और एक महीने का एडवांस.
थोड़ी देर में ही एकाउंटेंट एक लिफ़ाफ़े में टर्मिनेशन लैटर और एक चेक उसकी टेबल पर रख गया.
सोमेश ने एकाउंटेंट को ताकीद की कि वह इसके बारे में किसी को ना बताये वह खुद मिथिलेश से बात करेगा.
सोमेश ने चपरासी को चाय लाने के लिये कहा और आंख बंद कर खुद को रिलेक्स करने की कोशिश करने लगा.
अचानक फोन की घंटी बजी. मौर्या होटल से फोन था.
सोमेश फुर्ती से ऑर्डर नोट करने लगा. आइटम्स के साथ ही उसे मौर्या के परचेज ऑफिसर वर्मा के शब्द कानों में पड़े आज आपको खुश कर देंगे सोमेश बाबू.
बहुत बड़ा ऑर्डर निकला है.
अगले पंद्रह मिनट भी दूसरे ग्राहकों के ऑर्डर नोट करने में ही बीते. अचानक कमाल हो गया था. कुछ ही देर में उसके पास ढेर सारे ऑर्डर थे.
सोमेश डिलिवरी की अगली व्यवस्था के बारे में सोचने लगा. कर लेंगे मैनेज. काम तो आये बन्दों की कमी नहीं है.
तभी फिर फोन बजा.
सोमेश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ रिसीवर कान पर लगाया तो दूसरी तरफ से पत्नी की आवाज आई.
'सुनो जी नाराज ना होना आज बहुत गड़बड़ हो गई. मैं पार्लर गई हुई थी अभी लौटी तो पता चला.
वो मरी कामवाली है ना उसने बड़ा नुक्सान कर दिया.
तुम जो दो महीने पहले चाइना से बीस हजार में क्वार्ट्ज का गुडलक वाला लाफिंग बुद्धा लाये थे ना. वो मरी ने सफाई करते वक्त तोड़ दिया.
आधे घंटे पहले टूटा है. चार टुकड़े हो गये उसके'.
हम्म ! आकर देखता हूं कहकर उसने फोन काट दिया.
सोमेश सीट से उठ खड़ा हुआ और ऑफिस में टहलने लगा.
खिड़की से बाहर झांका तो मिथिलेश डिलिवरी वैन के ड्राईवर के साथ किसी बात पर हंसता हुआ दिखाई दिया. कितनी सरल हंसी थी उसकी.
सोमेश ने टेबल पर से टर्मिनेशन लैटर और चेक वाला लिफाफा उठाया और पुर्जा पुर्जा कर डस्टबीन के हवाले कर दिया…