अंतरजाल
मेरी कविताएं, कहानियां, संवाद और लेख...
बुधवार, 8 जून 2016
बरगद
पिघल कर
बह जाने दे
अतीत
और भविष्य
दोनों
मर जाने दे
प्यास ने
बुनी है
नई परिभाषा
झूलती
जड़ों को
जीवन की आशा
शिखर को आधार से
मिल जाने दे
जिंदगी
बरगद हो जाने दे...
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