दायरे में रहे
हदों की सुनी
उधारी के धागों से
चादर बुनी
पड़ गयी छोटी
अब क्या करें
ओढ़ें या धरें
बहती नदिया को
आड़े हाथों लिया
बदलाव को
हाशिये पर किया
पोखर की सड़न
मुश्किल बनी
अब क्या करें
डूबें या तरें
वक्त का हर लम्हा
गंवा सा दिया
कल की आस में
आज मिट्टी किया
चुक गयी उम्र
अब क्या करें
जीयें या मरें...
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