अंतरजाल
मेरी कविताएं, कहानियां, संवाद और लेख...
शुक्रवार, 10 जून 2016
उद्घोष
धरा को
लिटाकर
आकाश को
बिठाकर
सूरज को
बर्फ का
आईना दिखाकर
दिशाओं को
उनके
अंधकार में
जलाता हूं
मैं समय को
गोद में
खिलाता हूं
अतीत और
भविष्य को
खूंटी पर
टांगा है
मौन से
थोड़ा सा
विद्रोह
मांगा है
रेत की
कनी में
सागर
सुखाता हूं...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें