सोमवार, 22 मई 2017

गांडू

सुधीर मध्यम गति से मोटर साईकिल चलाता हुआ नाला पार जा रहा था.
अभी बारह भी नहीं बजे थे लेकिन आसमान से आग बरसने लगी थी. कड़ी धूप बदन को झुलसाए दे रही थी.
गर्म हवा के धूल भरे बगूले इधर से उधर उड़ रहे थे.
सुधीर सोचने लगा अगर यह जरुरी पेमेंट ना उठानी होती तो इस माहौल में वह हरगिज बाहर ना निकलता.

अचानक सुधीर की निगाह एक बोरियों से लदे हथठेले पर पड़ी जिसे एक सतरह अठारह साल का लड़का खींच रहा था. लड़का पसीना पसीना होता हुआ पूरा जोर लगा कर ठेले को नाले की पुलिया पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा था पर साफ लगता था यह काम उसके अकेले के बस का नहीं.
सुधीर का कलेजा मुंह को आ गया.
उसने मोटर साईकिल सड़क किनारे एक ओर खड़ी की और हथठेले को धक्का लगाने लगा. सहारा मिलता देख लड़के ने भी उत्साह दिखाया और हाथठेला पुलिया पर चढ़ गया.

सुधीर की इतने में ही सांस फूल गई, हांफते हुए लड़के से बोला 'बड़ा कमीना है तेरा मालिक तुझे अकेले ही इस गर्मी में भेज दिया'.
'जानता नहीं क्या रास्ते में पुलिया पड़ेगी'.
लड़का बोला "जानता है, मैंने पुलिया का कहा भी था पर मालिक बोला तू चल तो सही देखना पुलिया पर कोई ना कोई नर्मदिल गांडू धक्का लगाने के लिए मिल ही जायेगा"

सुनकर सुधीर को समझ नहीं आ रहा था की इस पुलिया पर से नाले में वह खुद कूदे या फिर लड़के को कुदा दे.
                

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